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माननीय को लगता है हेट स्पीच नहीं है — “गोली मारो सालों को…”

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 मई 2026

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में शब्द सिर्फ शब्द नहीं होते, वे समाज की दिशा तय करते हैं। यहां नेताओं की भाषा जनता के मन में उतरती है, माहौल बनाती है और कई बार हालात को बदल भी देती है। ऐसे में जब “देश के गद्दारों को, गोली मारो…” जैसे नारे को हेट स्पीच नहीं माना जाता, तो यह बहस सिर्फ कानून तक सीमित नहीं रहती, बल्कि हमारे सामाजिक चरित्र और संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़ा करती है। यह बात और भी गंभीर हो जाती है, खासकर तब जब हम उस समय को याद करते हैं जब दिल्ली दंगों की आग में जल रही थी। उस दौर में हर शब्द, हर बयान और हर नारा बेहद संवेदनशील था। ऐसे माहौल में अगर मंचों से “गोली मारो…” जैसे नारे गूंजते हैं, तो उनका असर सिर्फ भाषण तक सीमित नहीं रहता। यह भीड़ के मन में गुस्से को और भड़काने का काम कर सकता है, तनाव को और बढ़ा सकता है और हालात को नियंत्रण से बाहर ले जा सकता है।

कानून अपनी कसौटियों पर चलता है। अदालतें देखती हैं कि क्या किसी बयान से सीधे हिंसा भड़की या नहीं, क्या इरादा साफ तौर पर हिंसा फैलाने का था या नहीं। लेकिन समाज के स्तर पर असर इतना सीधा और सीमित नहीं होता। कई बार शब्द धीरे-धीरे माहौल बनाते हैं, लोगों की सोच को प्रभावित करते हैं और फिर वही सोच किसी बड़े विस्फोट का कारण बन जाती है। यही कारण है कि हर बात को सिर्फ कानूनी नजरिए से देखना काफी नहीं होता।

जरा सोचिए—अगर एक शहर पहले से तनाव में है, लोग डर और गुस्से के बीच जी रहे हैं, और उसी समय इस तरह के नारे लगाए जाएं, तो उसका क्या असर होगा? क्या यह आग पर घी डालने जैसा नहीं है? लोकतंत्र में नेताओं की जिम्मेदारी सिर्फ अपने समर्थकों को खुश करना नहीं होती, बल्कि पूरे समाज को संतुलित रखना भी होती है। भाषा अगर जिम्मेदारी से बाहर हो जाए, तो उसका असर बहुत दूर तक जाता है।

आज की राजनीति में भाषा का स्वर तेजी से बदल रहा है। बहस और संवाद की जगह अब उकसाने वाले नारे लेते जा रहे हैं। यह बदलाव सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज के व्यवहार में भी दिखाई देने लगता है। जब नेता आक्रामक भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो आम लोग भी उसी भाषा को अपनाने लगते हैं, और धीरे-धीरे यह सामान्य बन जाता है।

सबसे बड़ा खतरा यही है—सामान्य हो जाना। अगर “गोली मारो…” जैसे नारे हमें अब चौंकाते नहीं हैं, तो इसका मतलब है कि हम एक खतरनाक दिशा में बढ़ रहे हैं। क्योंकि जब शब्दों में हिंसा सामान्य हो जाती है, तो असल हिंसा भी दूर नहीं रहती।

यह मामला हमें एक बार फिर आईना दिखाता है। अदालत ने कानून के दायरे में फैसला दिया, लेकिन समाज को अपने दायरे में सोचना होगा। हमें यह तय करना होगा कि हम कैसी भाषा को स्वीकार करते हैं और कैसी भाषा को नहीं। लोकतंत्र सिर्फ कानून से नहीं चलता, वह समाज की चेतना और जिम्मेदारी से भी चलता है।

सवाल वही है—क्या ऐसी भाषा, खासकर दंगों जैसे संवेदनशील समय में, समाज को जोड़ सकती है या फिर तोड़ती है? अगर जवाब साफ है, तो फिर हमें भी उतनी ही साफ सोच के साथ तय करना होगा कि हम किस तरह की राजनीति और भाषा को आगे बढ़ाना चाहते हैं।

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