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2 अप्रैल को बने डिप्टी लीडर, 15 को ईडी का छापा, 24 को छोड़ा केजरीवाल का साथ: अशोक मित्तल का सियासी यू-टर्न

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राजनीति | आलोक रंजन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/ चंडीगढ़ | 25 अप्रैल 2026

राजनीति में घटनाएं कभी-कभी इतनी तेजी से बदलती हैं कि हर नया मोड़ पुराने समीकरणों को पूरी तरह उलट देता है। आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद अशोक मित्तल का हालिया सियासी कदम भी कुछ ऐसा ही संकेत दे रहा है। महज 22 दिनों के भीतर उनकी भूमिका, परिस्थितियां और राजनीतिक रुख तीन अलग-अलग दिशाओं में नजर आए—जिसने दिल्ली की राजनीति में हलचल तेज कर दी है।

सबसे पहले 2 अप्रैल को पार्टी नेतृत्व ने अशोक मित्तल को राज्यसभा में डिप्टी लीडर की जिम्मेदारी सौंपी। यह नियुक्ति इस बात का संकेत थी कि पार्टी में उनकी स्थिति मजबूत हो रही है और नेतृत्व उन्हें आगे बढ़ाना चाहता है। अरविंद केजरीवाल की टीम में उनका यह कद बढ़ना कई राजनीतिक विश्लेषकों के लिए महत्वपूर्ण संकेत माना गया।

लेकिन 15 अप्रैल को घटनाक्रम अचानक बदल गया। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अशोक मित्तल से जुड़े ठिकानों पर छापेमारी की। इस कार्रवाई ने न केवल उनके राजनीतिक सफर को झटका दिया, बल्कि आम आदमी पार्टी के भीतर भी असहजता पैदा कर दी। विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाते हुए AAP पर सवाल उठाए, जबकि पार्टी ने इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने मित्तल की स्थिति को अस्थिर जरूर कर दिया।

राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई कि क्या यह जांच आगे चलकर उनकी भूमिका और पार्टी में उनके भविष्य को प्रभावित करेगी। इसी बीच 24 अप्रैल को सबसे बड़ा मोड़ आया—जब अशोक मित्तल ने अचानक अरविंद केजरीवाल का साथ छोड़ दिया। यह फैसला जितना अप्रत्याशित था, उतना ही चौंकाने वाला भी।

मित्तल का यह कदम केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि दबाव, जांच और बदलते राजनीतिक समीकरणों का परिणाम माना जा रहा है। हालांकि उन्होंने अपने फैसले के पीछे के कारणों पर खुलकर कुछ नहीं कहा, लेकिन उनके इस यू-टर्न ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।।क्या ईडी की कार्रवाई ने उन्हें राजनीतिक रूप से कमजोर किया? क्या पार्टी के भीतर भरोसे की कमी पैदा हो गई थी? या फिर यह कोई बड़ा रणनीतिक कदम है?

इन सवालों के जवाब अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन इतना जरूर है कि मित्तल के इस फैसले ने AAP को झटका दिया है। पहले ही पार्टी के कई नेता अलग-अलग कारणों से दूरी बना चुके हैं, और अब एक वरिष्ठ सांसद का इस तरह अलग होना संगठन के लिए चुनौती बन सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल एक व्यक्ति का यू-टर्न नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक बदलाव का संकेत भी हो सकता है। जिस तरह से केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई और उसके बाद नेताओं के फैसले सामने आ रहे हैं, वह आने वाले समय में कई और बदलावों की ओर इशारा करता है।अशोक मित्तल का यह कदम दिल्ली की राजनीति में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि वह किस दिशा में जाते हैं और उनका यह फैसला किस तरह के राजनीतिक परिणाम लेकर आता है। वहीं, आम आदमी पार्टी के लिए यह समय अपने संगठन और नेतृत्व को और मजबूत करने की चुनौती लेकर आया है।

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