स्वास्थ्य / अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू | 25 अप्रैल 2026
मां और नवजात शिशुओं की सुरक्षा के लिए बेहद अहम माने जाने वाले बर्थिंग सेंटर अब गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रहे हैं। नए बजट में की गई कटौती ने इन केंद्रों के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला मातृ स्वास्थ्य क्षेत्र में पिछले वर्षों में हासिल की गई बड़ी उपलब्धियों को कमजोर कर सकता है।
नेपाल में सामने आई स्थिति इस संकट की गंभीरता को साफ तौर पर दिखाती है, जहां सरकार ने आगामी वित्तीय वर्ष के लिए स्वास्थ्य बजट में करीब 20 प्रतिशत तक कटौती कर दी है। इसका सीधा असर “सेफ मदरहुड” जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों पर पड़ रहा है, जिनकी बदौलत पिछले दो दशकों में मातृ मृत्यु दर में 70 प्रतिशत से अधिक की कमी आई थी।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार देशभर में 2700 से अधिक बर्थिंग सेंटर संचालित हो रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या में संविदा पर नियुक्त स्वास्थ्यकर्मी कार्यरत हैं। बजट में कटौती के चलते इन कर्मचारियों की नौकरी पर खतरा मंडरा रहा है और कई केंद्रों को आने वाले महीनों में अपनी सेवाएं बंद करनी पड़ सकती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा बजट केवल चार महीने तक ही सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों को चलाने के लिए पर्याप्त है। यदि जल्द ही अतिरिक्त फंडिंग की व्यवस्था नहीं की गई, तो बर्थिंग सेंटरों के साथ-साथ लैब सेवाएं और अन्य प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।
स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि सरकार पहले से ही अस्पतालों और बर्थिंग सेंटरों का बड़ा भुगतान बकाया रखे हुए है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं की निरंतरता बाधित हो रही है और पूरा ढांचा कमजोर पड़ता जा रहा है।
वैश्विक स्तर पर भी मातृ स्वास्थ्य सेवाओं पर फंडिंग संकट का असर दिखाई दे रहा है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, संसाधनों की कमी के चलते कई देशों में मातृ स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो रही हैं, जिससे लाखों महिलाओं की सुरक्षित प्रसव तक पहुंच खतरे में पड़ सकती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि बर्थिंग सेंटर बंद होते हैं, तो ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में रहने वाली महिलाओं को समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाएगी। इससे प्रसव के दौरान जटिलताएं और जोखिम कई गुना बढ़ सकते हैं। बजट में कटौती का यह फैसला सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं बल्कि एक गंभीर सामाजिक और मानवीय संकट का संकेत है—जहां सबसे अधिक असर उन माताओं और नवजातों पर पड़ेगा, जिन्हें सबसे ज्यादा सुरक्षा और देखभाल की जरूरत होती है।




