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नीतीश कुमार का आखिरी मोड़: सुशासन बाबू से राज्यसभा सांसद तक — जेडीयू की उल्टी गिनती या बीजेपी में विलय का नया अध्याय?

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ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | पटना/ नई दिल्ली | 16 अप्रैल 2026

नीतीश के चौंकाने वाले फैसले की पृष्ठभूमि

नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति पर दो दशक से अधिक समय तक अपनी छाप छोड़ी, सुशासन के नाम से मशहूर हुए, गठबंधनों का जादूगर साबित हुए और बार-बार सत्ता की कुर्सी संभाली, लेकिन अप्रैल 2026 में उनका फैसला सबको चौंका गया जब उन्होंने मुख्यमंत्री का पद छोड़कर राज्यसभा सांसद बनना स्वीकार कर लिया, जिसके बाद 14 अप्रैल को औपचारिक रूप से इस्तीफा देकर उन्होंने बिहार की सत्ता बीजेपी के हाथों सौंप दी और अब सम्राट चौधरी बिहार के पहले बीजेपी मुख्यमंत्री बन चुके हैं।

नीतीश की असली समस्या और बीजेपी के कठपुतली बनने का कारण

असल में नीतीश की समस्या उनकी बढ़ती उम्र, स्वास्थ्य की चिंता और सत्ता के संतुलन में बदलाव थी, क्योंकि 2025 के विधानसभा चुनाव के बाद जेडीयू भले ही अच्छी सीटें लाई लेकिन बीजेपी उससे आगे निकल चुकी थी और नीतीश को मजबूरन होम मिनिस्ट्री जैसे अहम विभाग बीजेपी को सौंपने पड़े, जिससे वे धीरे-धीरे बीजेपी के कठपुतली जैसे दिखने लगे थे, क्योंकि उनका अपना वोट बैंक कुर्मी-ईबीसी पहले से ही बीजेपी की ओर शिफ्ट हो रहा था और बार-बार गठबंधन बदलने की वजह से उनकी विश्वसनीयता भी प्रभावित हुई थी, जिसके चलते वे सत्ता बचाने के लिए बीजेपी के आगे झुकने को मजबूर हुए।

डीजीपी से सिपाही बनकर रिटायर होने जैसा फैसला!

किसी डीजीपी को सिपाही बनाकर रिटायर कर देने जैसा ही यह फैसला था, क्योंकि दस बार मुख्यमंत्री रहने वाले नीतीश अब दिल्ली की संसद में सांसद बनकर ‘मेंटर’ या गाइडेंस देने वाले रोल में चले गए हैं, जबकि असली सत्ता का केंद्र बिहार में बीजेपी के पास चला गया है, हालांकि उन्होंने खुद इसे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा बताया कि उन्होंने हमेशा विधानमंडल के दोनों सदनों और संसद के दोनों सदनों का सदस्य बनना चाहा था, लेकिन हकीकत यह है कि स्वास्थ्य की वजह से रोजमर्रा की जिम्मेदारियों का बोझ, विपक्ष का दबाव और बीजेपी का बढ़ता दबाव उन्हें इस डिमोशन को स्वीकार करने पर मजबूर कर गया, खासकर जब उनके बेटे निशांत कुमार को हाल ही में पार्टी में लाया गया था ताकि बिना डायनेस्टी के आरोप के पार्टी का भविष्य संभाला जा सके।

जेडीयू में उल्टी गिनती शुरू

नीतीश के इस फैसले ने जेडीयू के अंदर उल्टी गिनती शुरू कर दी है, क्योंकि कार्यकर्ता नाराज हैं, नालंदा जैसे इलाकों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और पार्टी में अब ‘अगला चेहरा कौन’ का सवाल जोरों पर है, जेडीयू बिखरकर पूरी तरह खत्म तो नहीं होने वाली है क्योंकि नीतीश अभी भी पार्टी अध्यक्ष हैं और उनका करिश्मा तथा नेटवर्क कुछ सीटें अभी भी दिला सकता है, लेकिन लंबे समय में अगर कोई मजबूत उत्तराधिकारी नहीं उभरा तो कई नेता बीजेपी से जुड़ जाएंगे, क्योंकि सत्ता का केंद्र अब बीजेपी के पास है और सत्ता का स्वाद चखने वाले नेता स्वाभाविक रूप से शिफ्ट हो रहे हैं, खासकर जब सम्राट चौधरी जैसे नेता सीएम बन चुके हैं और बीजेपी बिहार में पूर्ण रूप से हावी होने की राह पर है।

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