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बंगाल में नाम हटते ही मौत मांगने को मजबूर हुए 6 लोग, राष्ट्रपति के पास पहुंची ‘इच्छा मृत्यु’ की अर्जी – SIR के नाम पर क्या लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है?

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राष्ट्रीय / पश्चिम बंगाल | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता | 15 अप्रैल 2026

पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) ने आम जनता की जिंदगी को नर्क बना दिया है। हुगली जिले के आरामबाग नगरपालिका क्षेत्र के वार्ड नंबर 6 के छह साधारण नागरिकों ने अब सीधे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के पास दस्तक दी है। इन लोगों ने नाम मतदाता सूची से कट जाने के बाद इतना भयानक आतंक महसूस किया कि उन्होंने लिखित अर्जी में इच्छा मृत्यु यानी euthanasia की मांग कर दी। इन छह लोगों का कहना है कि मतदाता सूची से नाम हटने के बाद अब उन्हें डिटेंशन कैंप में भेज दिए जाने का खौफ सताने लगा है। मौत को उन्होंने बेहतर विकल्प मान लिया है। इन छह आवेदकों में एक सेवानिवृत्त हेडमिस्ट्रेस तैबुनेसा बेगम भी शामिल हैं, जिन्होंने गोगहाट की भगवती गर्ल्स स्कूल में 20 साल तक प्रधानाध्यापिका के रूप में सेवा की।

उनके पति अरामबाग गर्ल्स कॉलेज के प्रिंसिपल हैं। इतनी सम्मानित और स्थापित पृष्ठभूमि वाले लोग भी जब मौत की भीख मांगने को मजबूर हो जाते हैं तो समझ लीजिए कि बंगाल की सियासी और प्रशासनिक व्यवस्था कितनी गहरी खाई में गिर चुकी है। सोमवार को ये छह लोग आरामबाग के एसडीओ कार्यालय पहुंचे, जो चुनाव अधिकारी भी हैं, और राष्ट्रपति को आवेदन सौंपा। उसी वार्ड में कुल 206 नाम SIR प्रक्रिया में काटे गए हैं।

चुनाव आयोग के महासचिव ज्ञानेश कुमार के निर्देश पर चलाई गई इस SIR मुहिम में पूरे बंगाल से करीब 90.83 लाख नाम मतदाता सूची से काट दिए गए हैं। फरवरी में 63 लाख नाम पहले ही हटा दिए गए थे, फिर ज्यूडिशियल ऑफिसरों ने 60 लाख से ज्यादा मामलों की सुनवाई की और अतिरिक्त 27 लाख से ज्यादा नाम काट दिए। कुल मिलाकर राज्य की मतदाता संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 6.75 करोड़ रह गई है – यानी करीब 12 प्रतिशत की भारी कटौती। सबसे ज्यादा कटौती बांग्लादेश सीमा से सटे मुस्लिम बहुल जिलों मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना आदि में हुई है। टीएमसी इसे अल्पसंख्यक वोटरों का सफाया बता रही है तो बीजेपी इसे घुसपैठियों की सफाई बता रही है, लेकिन हकीकत ये है कि स्कूल टीचर, प्रिंसिपल परिवार, बुजुर्ग और गरीब-मजदूर भी अब ‘अवैध’ करार दिए जा रहे हैं।

आरामबाग के इन छह लोगों का आवेदन सिर्फ एक छोटा सा उदाहरण है। पूरा बंगाल इस भय के साए में सिमट रहा है। नाम कटने के बाद लोगों को नोटिस भी सही से नहीं मिल रहे, सुनवाई का मौका कम, और डिटेंशन कैंप का डर हर किसी के मन में घर कर गया है। अगर कल कोई व्यक्ति भय, गुस्से या निराशा में कोई कदम उठा ले तो उसकी पूरी जिम्मेदारी चुनाव आयोग की, ज्ञानेश कुमार की और केंद्र सरकार की होगी। क्या बिना ठोस सबूत और बिना उचित प्रक्रिया के लाखों-करोड़ों लोगों को इस कदर आतंकित करना लोकतंत्र की सेवा है? या फिर यह 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले एक तरफा खेल है?

बंगाल की जनता अब सवाल पूछ रही है – कल तक जो वोटर था, आज वो संदिग्ध कैसे हो गया? 91 लाख लोगों को बिना पूछे नाम काटकर उन्हें मौत या डिटेंशन का भय दिखाना कहां तक न्यायसंगत है? आरामबाग के ये छह लोग अब सिर्फ मतदाता नहीं, बल्कि मौत की गुहार लगाते हुए राष्ट्रपति के दरवाजे पर खड़े हैं। बंगाल में SIR का ये आतंक कब तक चलेगा? कब तक लोग ‘हमें मार दो, डिटेंशन मत भेजो’ लिखकर आवेदन देंगे?

ये लोकतंत्र नहीं, डर और दमन का काला साम्राज्य है। जनता अब जाग रही है और सड़कों पर उतरने को तैयार है। बंगाल जल रहा है – और यह आग किसने लगाई, यह सवाल अब हर किसी के जेहन में है।

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