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CEC ज्ञानेश कुमार की संपत्तियों पर सियासी तूफान: RTI से उठे सवाल, विपक्ष ने निष्पक्षता पर जताई शंका

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राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 15 अप्रैल 2026

देश की नौकरशाही और चुनाव प्रणाली को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है, जिसमें तृणमूल कांग्रेस के पूर्व राज्यसभा सांसद साकेत गोखले ने गंभीर आरोप लगाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की संपत्तियों को लेकर कई सवाल उठाए हैं। गोखले ने दावा किया है कि ज्ञानेश कुमार के IAS कार्यकाल के दौरान दाखिल किए गए इम्मूवेबल प्रॉपर्टी रिटर्न (IPR) रिकॉर्ड अचानक सार्वजनिक वेबसाइट से हटा दिए गए हैं और अब सरकार उन्हें “निजी जानकारी” बताकर देने से इनकार कर रही है।

गोखले के मुताबिक, सभी IAS अधिकारियों के लिए हर साल अपनी संपत्ति का ब्योरा देना अनिवार्य होता है, जिसे DoPT की वेबसाइट पर सार्वजनिक रूप से अपलोड किया जाता है। उनका कहना है कि ज्ञानेश कुमार के मामले में भी यही प्रक्रिया लागू थी और उनके रिकॉर्ड पहले उपलब्ध थे, लेकिन फरवरी 2025 में मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद ये जानकारी वेबसाइट से गायब हो गई। इस बदलाव को लेकर उन्होंने सवाल उठाया है कि जो जानकारी वर्षों तक सार्वजनिक रही, वह अचानक निजी कैसे हो गई।

इस संबंध में दायर RTI के जवाब में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने यह कहते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया कि मांगी गई सूचना “पर्सनल इंफॉर्मेशन” है और RTI Act की धारा 8(1)(j) के तहत इसे साझा नहीं किया जा सकता। हालांकि, गोखले का तर्क है कि जब यह जानकारी पहले सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध थी, तो इसे निजी बताना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

इस पूरे विवाद ने अब राजनीतिक रंग भी ले लिया है। विपक्षी दलों में ज्ञानेश कुमार को लेकर अविश्वास का माहौल साफ दिखाई दे रहा है। विपक्ष का मानना है कि उनके रहते चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं और कई दल उन्हें शंका की नजर से देख रहे हैं। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि मौजूदा हालात में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव को लेकर गंभीर आशंकाएं बनी हुई हैं।

गोखले ने यह भी सवाल उठाया है कि जब चुनाव लड़ने वाला हर उम्मीदवार अपनी संपत्तियों का खुलासा करता है और न्यायपालिका तक में पारदर्शिता की परंपरा है, तो देश के मुख्य चुनाव आयुक्त की पूर्व संपत्तियों को सार्वजनिक करने में हिचक क्यों हो रही है। उनके मुताबिक, यह मामला सिर्फ एक अधिकारी की संपत्ति का नहीं, बल्कि संस्थागत पारदर्शिता और जवाबदेही का है। इस पूरे मामले पर सरकार या चुनाव आयोग की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन यह विवाद तेजी से राजनीतिक बहस का केंद्र बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट जवाब सामने आता है या फिर यह मामला और गहराता है।

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