व्यापार/ ग्राउंड रिपोर्ट | ABC NATIONAL NEWS | सूरत | 9 अप्रैल 2026
सूरत, जिसे देश की टेक्सटाइल राजधानी कहा जाता है, इस समय एक गहरे औद्योगिक संकट से गुजर रहा है। कभी दिन-रात गूंजने वाली पावरलूम मशीनों की आवाज अब धीमी पड़ गई है और कई इलाकों में तो पूरी तरह सन्नाटा देखने को मिल रहा है। उद्योग पर एक साथ दोहरी मार पड़ी है—एक तरफ मजदूरों का तेज़ी से पलायन और दूसरी तरफ कच्चे माल की कीमतों में भारी उछाल। इस संकट ने न केवल उत्पादन को आधा कर दिया है, बल्कि छोटे और मध्यम स्तर के उद्योगपतियों के सामने अस्तित्व का संकट भी खड़ा कर दिया है। स्थानीय कारोबारी मानते हैं कि अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो सूरत की टेक्सटाइल पहचान को गंभीर झटका लग सकता है।
मजदूरों का पलायन इस संकट का सबसे बड़ा कारण बनकर सामने आया है। सूरत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और ओडिशा से आए प्रवासी मजदूरों पर निर्भर करती है, लेकिन हाल के दिनों में महंगाई, एलपीजी गैस की कमी और जीवनयापन की बढ़ती लागत ने उन्हें शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया है। हजारों मजदूर अचानक अपने गांवों की ओर लौट गए, जिससे फैक्ट्रियों में काम करने वाले हाथों की भारी कमी हो गई। नतीजा यह हुआ कि कई यूनिट्स को अपनी मशीनें बंद करनी पड़ीं, जबकि जो फैक्ट्रियां चल भी रही हैं, वे आधी क्षमता पर काम करने को मजबूर हैं। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि श्रमिकों की संख्या में 30 से 40 प्रतिशत तक गिरावट आई है, जो इस सेक्टर के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।
दूसरी तरफ कच्चे माल की बढ़ती कीमतों ने उद्योग की कमर तोड़ दी है। मैन-मेड फाइबर, जो क्रूड ऑयल से बनता है, उसके दामों में 30 से 35 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। इसका सीधा असर यार्न और कपड़े की लागत पर पड़ा है, जिससे उत्पादन महंगा हो गया है। पहले जो धागा ₹100 प्रति किलो के आसपास मिलता था, वह अब ₹135-140 तक पहुंच चुका है। इस बढ़ोतरी ने उत्पादन लागत को इतना बढ़ा दिया है कि कई छोटे कारोबारी अपने ऑर्डर पूरे करने में असमर्थ हो गए हैं। बुनाई, प्रोसेसिंग और डाइंग जैसे हर चरण पर इसका असर साफ दिखाई दे रहा है और पूरी सप्लाई चेन दबाव में है।
उत्पादन में आई गिरावट का असर अब आर्थिक नुकसान के रूप में सामने आ रहा है। पहले जहां सूरत में रोजाना करोड़ों मीटर कपड़ा तैयार होता था, वहीं अब यह आंकड़ा लगभग आधा रह गया है। उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इस गिरावट के कारण प्रतिदिन 90 से 100 करोड़ रुपये तक का नुकसान हो रहा है। कई फैक्ट्रियों ने अपने संचालन के दिन और समय कम कर दिए हैं—जहां पहले सातों दिन 24 घंटे काम होता था, वहां अब पांच दिन और सीमित घंटों में उत्पादन किया जा रहा है। इससे न केवल मालिकों की आय प्रभावित हुई है, बल्कि बचे हुए मजदूरों की कमाई पर भी सीधा असर पड़ा है।
इस संकट की एक और गंभीर परत यह है कि बाजार में मांग भी कमजोर पड़ती जा रही है। बढ़ती लागत के कारण तैयार कपड़ा महंगा हो गया है, जिससे व्यापारियों और ग्राहकों दोनों की खरीद क्षमता प्रभावित हुई है। घरेलू बाजार में मांग घट रही है, वहीं निर्यात भी प्रभावित हो रहा है। यानी उद्योग को एक साथ सप्लाई और डिमांड दोनों तरफ से झटका लग रहा है। यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो इसका असर देश के टेक्सटाइल निर्यात और रोजगार पर भी पड़ सकता है, क्योंकि सूरत इस सेक्टर का एक प्रमुख केंद्र है।
हालांकि उद्योग को आने वाले शादी और त्योहार सीजन से कुछ उम्मीद जरूर है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात जल्दी सामान्य नहीं होंगे। सरकार की ओर से कुछ राहत उपायों पर विचार किया जा रहा है, जैसे एलपीजी की उपलब्धता बढ़ाना और छोटे उद्योगों को सहारा देना, ताकि मजदूरों का पलायन रोका जा सके। लेकिन उद्योग से जुड़े लोग साफ कहते हैं कि जब तक कच्चे माल की कीमतें नियंत्रित नहीं होतीं और मजदूरों की वापसी सुनिश्चित नहीं होती, तब तक सूरत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री पूरी तरह पटरी पर लौटना मुश्किल है।
आखिरकार, सूरत की यह स्थिति सिर्फ एक शहर की कहानी नहीं है, बल्कि यह पूरे भारतीय टेक्सटाइल सेक्टर के सामने खड़े होते बड़े संकट की चेतावनी है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट और गहरा सकता है और लाखों लोगों की रोजी-रोटी पर सीधा असर डाल सकता है। अभी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या उद्योग इस दोहरी मार से उबर पाएगा या आने वाले दिनों में यह संकट और विकराल रूप लेगा।




