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क्या खून के आंसू रो रहा इजरायल – अमेरिका, पर्दे के पीछे ईरान को मिल रही चीनी मदद?

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एबीसी नेशनल न्यूज | अंतरराष्ट्रीय डेस्क | 9 मार्च 2026

युद्ध के बीच चीन की चुप लेकिन निर्णायक भूमिका

ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच एक ऐसा देश भी है जो सीधे युद्ध में शामिल नहीं है, लेकिन उसकी रणनीति पूरे संघर्ष की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा रही है। यह देश है चीन। बीजिंग ने खुले तौर पर किसी सैन्य कार्रवाई में हिस्सा नहीं लिया है, लेकिन आर्थिक, ऊर्जा और कूटनीतिक स्तर पर वह ईरान के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है। यही वजह है कि अमेरिका और इजरायल के लिए स्थिति और जटिल होती जा रही है। चीन ने हालिया हमलों की आलोचना करते हुए कहा है कि क्षेत्र में बढ़ता तनाव अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक स्थिरता के लिए खतरनाक है।

ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन

ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि चीन आज ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार बन चुका है। अनुमान के अनुसार ईरान के कुल तेल निर्यात का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा चीन ही खरीदता है। वर्ष 2025 में चीन ने रोजाना लगभग 13 से 14 लाख बैरल ईरानी तेल आयात किया। यह उसकी कुल समुद्री तेल आयात का करीब 13 से 14 प्रतिशत माना जाता है। इस व्यापार के जरिए ईरान को भारी आर्थिक राहत मिलती है और उस पर लगे पश्चिमी प्रतिबंधों का प्रभाव काफी हद तक कम हो जाता है।

अमेरिकी प्रतिबंधों को दरकिनार करने की रणनीति

रिपोर्टों के मुताबिक चीन और ईरान ने तेल व्यापार के लिए डॉलर आधारित व्यवस्था से अलग रास्ता भी तैयार किया है। कई मामलों में भुगतान चीनी मुद्रा युआन में किया जाता है, जिससे अमेरिकी वित्तीय प्रतिबंधों का असर कम हो जाता है। इतना ही नहीं, कई बार ईरानी तेल को दूसरे देशों के नाम पर भेजकर उसकी असली पहचान भी छिपाई जाती है, ताकि अंतरराष्ट्रीय निगरानी से बचा जा सके।

“शैडो फ्लीट” के जरिए चलता है गुप्त तेल कारोबार

अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का दावा है कि ईरान और चीन के बीच तेल व्यापार में तथाकथित “शैडो फ्लीट” यानी गुप्त जहाजों का भी इस्तेमाल किया जाता है। ये जहाज अक्सर अपनी पहचान छिपाकर समुद्र में तेल की ढुलाई करते हैं। कई बार जहाज बीच समुद्र में अपना नाम, झंडा या ट्रांसपोंडर तक बदल लेते हैं, जिससे उनका पता लगाना मुश्किल हो जाता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य में चीन को विशेष छूट

फारस की खाड़ी के सबसे अहम समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी चीन की भूमिका चर्चा में है। खबरों के अनुसार ईरान ने इस मार्ग से गुजरने वाले कुछ पश्चिमी देशों के जहाजों पर सख्ती दिखाई है, लेकिन चीन से जुड़े जहाजों को अपेक्षाकृत आसानी से गुजरने की अनुमति दी गई है। इससे चीन की ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित रहती है, जबकि पश्चिमी देशों पर रणनीतिक दबाव बना रहता है।

25 साल की रणनीतिक साझेदारी का असर

ईरान और चीन के बीच 25 वर्ष की दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी भी इस पूरे समीकरण को मजबूत बनाती है। इस समझौते के तहत चीन को रियायती दरों पर तेल की आपूर्ति मिलती है, जबकि बदले में वह ईरान के बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, परिवहन और उद्योग क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश करता है। इससे दोनों देशों के बीच आर्थिक और रणनीतिक संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं।

अमेरिका के लिए बढ़ती रणनीतिक चुनौती

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि चीन की यह नीति अमेरिका की “मैक्सिमम प्रेशर” रणनीति को कमजोर करती है। चीन सीधे टकराव से बचते हुए भी आर्थिक और ऊर्जा सहयोग के जरिए ईरान को पूरी तरह अलग-थलग पड़ने से बचा रहा है। यही वजह है कि कई विश्लेषक चीन को इस संघर्ष का “साइलेंट प्लेयर” कह रहे हैं, जिसकी चालें आने वाले समय में वैश्विक राजनीति के समीकरण बदल सकती हैं।

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