अंतरराष्ट्रीय | समी अहमद | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू | 27 अप्रैल 2026
नेपाल की राजनीति में एक बड़ा और अहम फैसला सामने आया है, जिसने पूरे दक्षिण एशिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। प्रधानमंत्री बालेन शाह ने चीन के साथ पिछले वर्षों में हुए इंफ्रास्ट्रक्चर समझौतों की व्यापक जांच का आदेश दिया है। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब नेपाल में चीन की बढ़ती भूमिका और उसके प्रभाव को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। सरकार ने साफ कर दिया है कि जब तक इन सभी परियोजनाओं की पूरी समीक्षा नहीं हो जाती, तब तक चीन के साथ किसी भी नए समझौते पर विचार नहीं किया जाएगा। इस कदम को नेपाल की नीति में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
दरअसल, जिन समझौतों की जांच शुरू हुई है, उनमें से अधिकतर केपी शर्मा ओली की सरकार के दौरान किए गए थे। उस समय इन परियोजनाओं को नेपाल के विकास के लिए ऐतिहासिक बताया गया था और कहा गया था कि इससे देश को क्षेत्रीय कनेक्टिविटी का बड़ा फायदा मिलेगा। लेकिन अब नई सरकार यह जानना चाहती है कि इन परियोजनाओं से वास्तव में कितना लाभ हुआ और कितनी परियोजनाएं सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गईं। साथ ही, इन प्रोजेक्ट्स के लिए चीन से लिए गए कर्ज और उनकी शर्तों की भी गहराई से जांच की जा रही है।
विशेषज्ञों और थिंक टैंकों की रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि पिछले कुछ वर्षों में नेपाल में चीन की भूमिका केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह राजनीतिक और रणनीतिक स्तर तक भी बढ़ी है। तिब्बत और ताइवान जैसे मुद्दों पर नेपाल पर दबाव बनाने से लेकर आंतरिक फैसलों को प्रभावित करने तक की बातें सामने आई हैं। यही कारण है कि अब नेपाल की नई सरकार इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित और पारदर्शी नीति बनाना चाहती है।
जांच के दायरे में कई बड़ी और चर्चित परियोजनाएं शामिल हैं। इनमें बूढ़ी गंडकी जलविद्युत परियोजना प्रमुख है, जिसे 2017 में चीन की कंपनी को दिया गया था, लेकिन बाद में यह परियोजना बार-बार रद्द और बहाल होने के बाद अब तक अधूरी पड़ी है। इसी तरह केरंग-काठमांडू रेलवे परियोजना, जिसे नेपाल और चीन के बीच एक बड़े कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट के रूप में देखा गया था, आज भी तकनीकी और वित्तीय कारणों से आगे नहीं बढ़ पाई है। इसके अलावा ट्रांस-हिमालयी कनेक्टिविटी नेटवर्क, सीमा पार ट्रांसमिशन लाइनें और उत्तरी राजमार्ग परियोजनाएं भी या तो अधूरी हैं या बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रही हैं।
इन परियोजनाओं की धीमी प्रगति और अधूरी स्थिति ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इतने बड़े निवेश और समझौतों के बावजूद जमीन पर काम क्यों नहीं दिख रहा। कई मामलों में यह भी आरोप लगे हैं कि परियोजनाओं की योजना और वित्तीय ढांचा स्पष्ट नहीं था, जिसके कारण वे समय पर पूरी नहीं हो सकीं। यही वजह है कि अब सरकार हर परियोजना की लागत, प्रगति और वास्तविक लाभ का आकलन कर रही है।
नेपाल सरकार का यह कदम सिर्फ आर्थिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि कूटनीतिक नजरिए से भी बेहद अहम माना जा रहा है। चीन के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखते हुए अपनी संप्रभुता और हितों की रक्षा करना नेपाल के लिए एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में यह जांच यह भी तय करेगी कि भविष्य में नेपाल किस तरह के अंतरराष्ट्रीय समझौते करता है और किन शर्तों पर करता है।
नेपाल का यह फैसला एक स्पष्ट संकेत देता है कि अब वह बिना पूरी पारदर्शिता और ठोस लाभ के किसी भी बड़े अंतरराष्ट्रीय समझौते में आगे नहीं बढ़ना चाहता। प्रधानमंत्री बालेन शाह का यह कदम देश के भीतर जवाबदेही तय करने के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर भी एक मजबूत संदेश देता है। आने वाले समय में इस जांच के नतीजे न सिर्फ नेपाल-चीन संबंधों को प्रभावित करेंगे, बल्कि पूरे क्षेत्रीय समीकरण पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।




