एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 8 मार्च 2026
मध्य-पूर्व में ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव और संभावित युद्ध की आशंकाओं के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा है कि मौजूदा हालात को देखते हुए यह आशंका पैदा हो रही है कि कहीं दुनिया फिर उसी रास्ते पर तो नहीं बढ़ रही, जैसा 2003 में इराक युद्ध से पहले देखा गया था।
चिदंबरम ने अपने लेख में कहा कि मध्य-पूर्व में प्रमुख शक्ति बनने की इजराइल की रणनीति के रास्ते में ईरान सबसे बड़ी बाधा के रूप में देखा जाता रहा है। उनके अनुसार आरोप लगाया जा रहा है कि इजराइल ने अमेरिका को इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया और ईरान में सत्ता परिवर्तन की रणनीति तैयार की गई। उनका कहना है कि इस तरह की रणनीति का उद्देश्य ईरान को कमजोर करना और उसे क्षेत्रीय राजनीति में अधीन स्थिति में लाना हो सकता है।
पूर्व वित्त मंत्री ने यह भी सवाल उठाया कि क्या ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर जो दावे किए जा रहे हैं, वे पूरी तरह प्रमाणित हैं या फिर दुनिया के सामने वही तर्क दोहराए जा रहे हैं जो कभी इराक के खिलाफ युद्ध से पहले पेश किए गए थे। उन्होंने याद दिलाया कि उस समय भी “विनाशकारी हथियारों” का आरोप लगाकर युद्ध शुरू किया गया था, लेकिन बाद में ऐसे हथियारों का कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया।
चिदंबरम के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बार सुरक्षा और रणनीति के नाम पर ऐसी कहानियां गढ़ी जाती हैं जिनका उद्देश्य सैन्य कार्रवाई को वैध ठहराना होता है। उन्होंने कहा कि आज भी दुनिया को सावधान रहने की जरूरत है ताकि किसी संभावित युद्ध के पीछे की वास्तविक सच्चाई सामने आ सके।
उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक समुदाय को जल्दबाजी में किसी सैन्य कार्रवाई का समर्थन करने के बजाय कूटनीति, संवाद और अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में समाधान खोजने पर जोर देना चाहिए।
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच चिदंबरम की यह टिप्पणी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस को जन्म दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान-इजराइल संघर्ष और गहरा हुआ तो इसका असर केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।




