एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 7 मार्च 2026
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच एक नई चर्चा तेज हो गई है कि क्या ईरान अमेरिका और इजरायल के खिलाफ अपने सैन्य अभियानों में चीन से जुड़े हथियारों और तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है। हाल के महीनों में ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता को लेकर सामने आई रिपोर्टों ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है।
दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में ईरान ने अपनी रक्षा प्रणाली को काफी मजबूत किया है। बैलिस्टिक मिसाइल, लंबी दूरी के ड्रोन और एंटी-शिप मिसाइलों के क्षेत्र में तेहरान ने तेज़ी से प्रगति की है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीकी विकास में कई विदेशी तकनीकों की अप्रत्यक्ष भूमिका रही है, जिनमें चीन से जुड़े उपकरण और तकनीकी सहयोग भी शामिल बताए जाते हैं।
माना जाता है कि ईरान के कुछ ड्रोन और मिसाइल कार्यक्रमों में ऐसे इलेक्ट्रॉनिक पुर्जे और डुअल-यूज़ तकनीक का इस्तेमाल हुआ है जो अंतरराष्ट्रीय बाजार के माध्यम से चीन से जुड़े नेटवर्क से हासिल किए गए। हालांकि बीजिंग ने आधिकारिक तौर पर इस तरह की किसी भी सैन्य सहायता से इनकार किया है और हमेशा यह कहा है कि वह क्षेत्र में शांति और स्थिरता का समर्थन करता है।
चीन और ईरान के संबंध केवल रक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग के मजबूत रिश्ते हैं। चीन ईरान के तेल का बड़ा खरीदार रहा है और दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक आर्थिक और बुनियादी ढांचे से जुड़े समझौते भी हुए हैं। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर चीन को ईरान का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार माना जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही चीन ईरान के साथ आर्थिक और कूटनीतिक स्तर पर खड़ा दिखाई देता हो, लेकिन वह अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ सीधे टकराव से बचने की नीति अपनाता है। यही कारण है कि चीन खुलकर किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनने से परहेज करता रहा है।
मध्य पूर्व में जारी मौजूदा तनाव के बीच यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है कि अगर संघर्ष और बढ़ता है तो क्या चीन केवल कूटनीतिक समर्थन तक सीमित रहेगा या ईरान के साथ अपने रणनीतिक सहयोग को और गहरा करेगा। फिलहाल वैश्विक राजनीति के इस जटिल समीकरण में चीन-ईरान संबंधों पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।




