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शहीद अयातुल्लाह अली खामेनेई: इस्लामी क्रांति की अमर विरासत, अमेरिका-इज़राइल की क्रूरता के सामने अडिग बहादुरी

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एबीसी नेशनल न्यूज | तेहरान | 2 मार्च 2026

दुनिया भर में इस्लामी प्रतिरोध के प्रतीक अयातुल्लाह अली खामेनेई की शहादत की खबर ने मध्य पूर्व को हिला कर रख दिया है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हवाई हमलों में तेहरान में उनके दफ्तर पर मिसाइल हमला हुआ, जिसमें वे शहीद हो गए। ईरानी राज्य मीडिया ने उन्हें “शहीद” घोषित किया और 40 दिनों का सार्वजनिक शोक मनाने की घोषणा की। यह घटना पिछले 70-80 वर्षों की सबसे बड़ी और सबसे प्रभावशाली घटना मानी जा रही है।

86 वर्षीय खामेनेई, जो 1989 से ईरान के सर्वोच्च नेता थे, मौत के खतरे से अच्छी तरह वाकिफ थे। उन्हें पता था कि अमेरिका और उसके सहयोगी उन्हें निशाना बना सकते हैं, फिर भी उन्होंने तेहरान छोड़ने से इनकार कर दिया। किसी बंकर में छिपने के बजाय वे अपने दफ्तर में सामान्य रूप से काम करते रहे और अंततः अपने कर्तव्य की राह में शहादत को गले लगा लिया। ईरानी मीडिया के अनुसार, हमले के समय वे “अपने दफ्तर में अपने कर्तव्यों का निर्वहन” कर रहे थे। उनके साथ उनके परिवार के कई सदस्य और अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी शहीद हुए।

ट्रंप ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में खामेनेई को “इतिहास की सबसे बुरी शख्सियतों में से एक” बताते हुए उनकी मौत पर खुशी जताई और दावा किया कि यह उनकी “जीत” है। लेकिन खामेनेई की शहादत के सामने यह कथित “बहादुरी” बेहद छोटी और खोखली लगती है। एक बुजुर्ग नेता, जो 36 साल से ईरान की कमान संभाल रहे थे, मौत से नहीं डरे—बल्कि उसे इस्लाम और प्रतिरोध की राह में कबूल कर लिया। असली बहादुरी तो शहादत में होती है, न कि ड्रोन और मिसाइलों के पीछे छिपकर हमला करने में।

यह शहादत मध्य पूर्व के इतिहास में एक टर्निंग पॉइंट है। जिस इस्लामी क्रांति और “प्रतिरोध की धुरी” (Axis of Resistance) के नाम पर ईरान खड़ा रहा—हिजबुल्लाह, हमास, हूती और अन्य—अब उसकी सारी तैयारियां, उसका पूरा सिस्टम इसकी सबसे कड़ी परीक्षा में है। ईरान की “अस्तित्व की लड़ाई” अब असल में शुरू हो गई है।

ईरान में सड़कों पर मातम का माहौल है, लेकिन यह सिर्फ दुख का नहीं—बदले की आग का भी है। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने इसे “अमेरिका-ज़ायोनी अपराध” बताया और बदला लेने की कसम खाई। एक अस्थायी तीन सदस्यीय परिषद (जिसमें अयातुल्लाह अली रज़ा आरफी शामिल हैं) अब देश की कमान संभाल रही है, जबकि नए सर्वोच्च नेता का चयन जल्द होने की उम्मीद है।

खामेनेई की शहादत नई पीढ़ी को प्रेरित करेगी। यह साबित करती है कि कुर्सी नहीं, हक की लड़ाई में कुर्बानी ही असली विरासत है।
शहीद अयातुल्लाह अली खामेनेई अमर रहें! उनकी शहादत से ईरान का प्रतिरोध और मजबूत होगा।
यह शहादत नई शुरुआत है।

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