एबीसी नेशनल न्यूज | वॉशिंगटन/नई दिल्ली | 1 मार्च 2026
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के कार्यकाल का अब तक का सबसे बड़ा विदेश नीति दांव ईरान पर की गई सैन्य कार्रवाई के रूप में सामने आया है। दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने दोबारा चुनाव अभियान के दौरान खुद को “पीस प्रेसिडेंट” यानी शांति का समर्थक राष्ट्रपति बताया था और कई बार कहा था कि वे ईरान के साथ टकराव का समाधान कूटनीतिक तरीके से चाहते हैं। लेकिन हालिया घटनाक्रम ने उनकी उस छवि को एक कठिन परीक्षा के सामने खड़ा कर दिया है।
विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप ने सैन्य कार्रवाई से पहले अमेरिकी जनता के सामने लंबी और विस्तृत दलील पेश नहीं की। हालांकि उन्होंने अपने स्टेट ऑफ द यूनियन संबोधन में ईरान के मुद्दे को संक्षेप में उठाया था और 28 फरवरी को जारी एक वीडियो संदेश में अपनी रणनीति और उद्देश्यों को स्पष्ट करने की कोशिश की। उस संदेश में उन्होंने कहा कि अमेरिका का मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना, क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करना और अमेरिकी हितों की रक्षा करना है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि ईरान बातचीत के लिए तैयार होता है तो कूटनीतिक रास्ता अब भी खुला है।
लेकिन आलोचकों का कहना है कि इतनी बड़ी सैन्य कार्रवाई से पहले व्यापक सार्वजनिक बहस और कांग्रेस में खुली चर्चा होनी चाहिए थी। डेमोक्रेटिक नेताओं ने सवाल उठाया है कि क्या व्हाइट हाउस ने पर्याप्त खुफिया जानकारी साझा की और क्या यह कदम क्षेत्रीय युद्ध का जोखिम बढ़ा सकता है। वहीं रिपब्लिकन खेमे के कई नेताओं ने राष्ट्रपति के फैसले का समर्थन करते हुए कहा है कि यह “निवारक और रणनीतिक” कदम था।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिक्रिया मिली-जुली रही है। कुछ सहयोगी देशों ने अमेरिका के सुरक्षा तर्क को समझने की बात कही है, जबकि कई देशों ने तनाव कम करने और कूटनीति पर लौटने की अपील की है। संयुक्त राष्ट्र में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई है और संयम बरतने का आह्वान किया गया है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कदम ट्रंप की राजनीतिक छवि को मजबूत करेगा या उन्हें घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना का सामना करना पड़ेगा। यदि हालात नियंत्रण में रहते हैं और कूटनीतिक रास्ता खुलता है तो व्हाइट हाउस इसे निर्णायक नेतृत्व के तौर पर पेश कर सकता है। लेकिन यदि संघर्ष लंबा खिंचता है या व्यापक युद्ध का रूप लेता है, तो यह दांव भारी भी पड़ सकता है।
आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि ट्रंप की यह रणनीति अमेरिकी विदेश नीति के लिए ऐतिहासिक मोड़ साबित होगी या विवाद का कारण बनेगी। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजर वॉशिंगटन और तेहरान के अगले कदम पर टिकी है।




