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‘जैसे फँसाती है चोर को खाँसी, वैसे गुनाहगार को झूठी माफ़ी’ — अखिलेश यादव का धर्मेंद्र प्रधान पर तंज

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एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 27 फरवरी 2026

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष Akhilesh Yadav ने एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक विवाद को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan और केंद्र सरकार पर जबरदस्त कटाक्ष बोला है। अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पोस्ट में सरकार की माफी को “दिखावटी” बताते हुए कहा कि जैसे चोर को खाँसी पकड़ लेती है, उसी तरह गुनाहगार को झूठी माफी बेनकाब कर देती है। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले बड़े आरोप लगाकर माहौल बनाया जाता है और जब विवाद बढ़ता है तो खेद जताकर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की जाती है।

अखिलेश यादव ने अपने पोस्ट में कहा कि भाजपा पहले दूसरों पर बड़े आरोप लगाकर अपने ऊपर लगे सवालों को छोटा दिखाने की रणनीति अपनाती है, लेकिन विवाद में फंसने पर माफी मांगकर निर्दोष दिखने की कोशिश करती है। उन्होंने इसे कपटपूर्ण राजनीति बताते हुए कहा कि ऐसी मंशा अंततः सामने आ ही जाती है और जनता सब समझती है। साथ ही उन्होंने सवाल उठाया कि सरकार चल रही है या मनमानी का “सर्कस” हो रहा है।

दरअसल यह पूरा विवाद एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में न्यायपालिका से जुड़े एक अध्याय को लेकर सामने आया, जिसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार, लंबित मामलों और जजों की कमी जैसी चुनौतियों का उल्लेख किया गया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कड़ी आपत्ति जताई और पुस्तक की सामग्री को लेकर सख्त टिप्पणियां कीं। बाद में संबंधित पुस्तक पर रोक लगाने, प्रतियां वापस लेने और अधिकारियों से जवाब तलब करने जैसे निर्देश दिए गए।

विवाद बढ़ने के बाद एनसीईआरटी ने माफी मांगते हुए कहा कि आपत्तिजनक सामग्री हटाकर अध्याय को दोबारा लिखा जाएगा। वहीं शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी कहा कि न्यायपालिका का अपमान करने का कोई इरादा नहीं था और मामले की जांच कर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने न्यायपालिका के प्रति सम्मान दोहराते हुए घटना पर दुख जताया और किताबों को तुरंत वापस लेने के निर्देश दिए।

अखिलेश यादव के बयान के बाद राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने पाठ्यपुस्तक बदलावों को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं, जबकि सरकार का कहना है कि यह एक त्रुटि थी और इसे सुधारने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। फिलहाल यह मुद्दा शिक्षा, न्यायपालिका और राजनीति—तीनों के केंद्र में बना हुआ है और आने वाले दिनों में इस पर बहस जारी रहने की संभावना है।

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