एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | फरवरी 2026
सोशल मीडिया पर उभरे दावे, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा
कुख्यात फाइनेंसर जेफ्री एप्सटीन से जुड़ी फाइलों को लेकर सोशल मीडिया और कुछ वैकल्पिक मंचों पर नए दावे सामने आए हैं। इन दावों में कहा जा रहा है कि इन फाइलों में तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा के नाम का उल्लेख कई बार किया गया है, जिनमें कथित तौर पर निजी मुलाक़ातों के संदर्भ भी बताए जा रहे हैं। इन दावों के सामने आते ही धार्मिक आस्थाओं, नैतिकता और सार्वजनिक जवाबदेही को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज़ हो गई है।
पुराना वीडियो फिर से साझा, नई व्याख्याएँ
इसी बहस के बीच दलाई लामा से जुड़ा एक पुराना सार्वजनिक वीडियो भी दोबारा सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो को लेकर अलग-अलग तरह की व्याख्याएँ सामने आ रही हैं। कुछ सोशल मीडिया यूज़र इसे अनुचित व्यवहार से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि समर्थकों का कहना है कि वीडियो के अंशों को संदर्भ से अलग करके पेश किया जा रहा है। यह वीडियो पहले भी वैश्विक मंचों पर चर्चा में रहा है और उस समय भी इस पर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आई थीं।
दावे क्या कहते हैं—और उनकी सीमाएँ
एप्सटीन से जुड़ी फाइलों में नामों और संपर्कों के उल्लेख को लेकर अब तक कोई स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी फाइलों में कई तरह के संपर्क, निमंत्रण और संदर्भ हो सकते हैं, जिनका अर्थ हर बार किसी आरोप या गलत आचरण से नहीं जोड़ा जा सकता। इसी तरह, वायरल वीडियो के मामले में भी संदर्भ, समय और पूरी रिकॉर्डिंग को समझना ज़रूरी बताया जा रहा है।
धार्मिक भावनाएँ, राजनीति और ध्रुवीकरण
इन मुद्दों पर प्रतिक्रियाएँ बेहद भावनात्मक हैं। समाजशास्त्रियों का मानना है कि जब अपुष्ट या अधूरी जानकारी तीखी भाषा के साथ साझा होती है, तो वह सामाजिक और धार्मिक ध्रुवीकरण को बढ़ा सकती है। ऐसे मामलों में संयम, तथ्य-जांच और संतुलित दृष्टिकोण की भूमिका और अधिक अहम हो जाती है।
जवाबदेही और तथ्य-जांच की मांग
कानूनी और मीडिया विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति से जुड़े दावों या वीडियो क्लिप्स पर निष्कर्ष निकालने से पहले प्रामाणिक स्रोतों, स्वतंत्र जांच और स्पष्ट संदर्भ अनिवार्य हैं। बिना पुष्टि के निष्कर्ष न केवल अनुचित माने जाते हैं, बल्कि वे सामाजिक तनाव और मानहानि जैसे गंभीर परिणाम भी ला सकते हैं।
आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतज़ार
एप्सटीन फाइलों में कथित उल्लेखों और वायरल वीडियो को लेकर संबंधित पक्षों की ओर से फिलहाल कोई नई, विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। जानकारों का कहना है कि यदि ठोस दस्तावेज़ या प्रमाण उपलब्ध कराए जाते हैं, तो उन्हें पारदर्शी ढंग से सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि अटकलों पर विराम लग सके।
सनसनी नहीं, सत्य
एप्सटीन से जुड़ी सामग्री पहले से ही अत्यंत संवेदनशील रही है। ऐसे में किसी भी नाम या वीडियो को लेकर उठे सवालों पर तथ्य-जांच, संतुलन और जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ना ही लोकतांत्रिक समाज के हित में है। सवाल पूछना ज़रूरी है, लेकिन बिना पुष्टि के आरोप समाज को बाँटते हैं। सच तक पहुँचने का रास्ता—जांच, पारदर्शिता और संयम—ही सबसे भरोसेमंद माना जा रहा है।




