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अडानी समूह पर गंभीर आरोप: मुकदमों के ज़रिये पत्रकारों को ‘चुप’ कराने की रणनीति

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एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 6 फरवरी 2026

पत्रकारिता पर दबाव का बढ़ता साया

अगर आप पत्रकार हैं और सत्ता के क़रीबी कॉरपोरेट समूहों पर सवाल उठाते हैं, तो परिणाम आसान नहीं रह गए हैं। मीडिया पर निगरानी रखने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था Reporters Without Borders (आरएसएफ) की ताज़ा रिपोर्ट ने भारत में पत्रकारिता की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर चिंता जताई है। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि Adani Group ने 2017 के बाद से खोजी पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के खिलाफ़ लंबे, महंगे और डराने वाले मुकदमे दायर किए हैं, जिनका असर खबरों की स्वतंत्रता पर पड़ा है।

एसएलएपीपी मुकदमों का आरोप

आरएसएफ के मुताबिक, अडानी समूह द्वारा दायर किए गए कई मामले तथाकथित SLAPP (Strategic Lawsuit Against Public Participation) की श्रेणी में आते हैं—ऐसे मुकदमे जिनका उद्देश्य अदालत में जीतना नहीं, बल्कि पत्रकारों को आर्थिक और मानसिक दबाव में डालकर चुप कराना होता है। रिपोर्ट का दावा है कि इन मुकदमों की लंबी प्रक्रिया और भारी कानूनी लागत के डर से कई पत्रकार और छोटे मीडिया संस्थान संवेदनशील रिपोर्टिंग से पीछे हटने को मजबूर हुए हैं।

खोजी पत्रकारिता पर असर

रिपोर्ट में कहा गया है कि अडानी समूह से जुड़ी परियोजनाओं, वित्तीय लेन-देन और नीतिगत लाभों पर सवाल उठाने वाली रिपोर्टिंग के बाद मुकदमों का सिलसिला तेज़ हुआ। इससे एक chilling effect पैदा हुआ—जहां सच सामने लाने से पहले पत्रकारों को संभावित कानूनी कार्रवाई का डर सताने लगा। मीडिया विशेषज्ञों के अनुसार, यह माहौल लोकतांत्रिक विमर्श के लिए घातक है।

सरकार और कॉरपोरेट संबंधों पर उठते सवाल

आलोचकों का कहना है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में बड़े कॉरपोरेट घरानों और सत्ता के बीच निकटता ने मीडिया की स्वतंत्रता को और कमजोर किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पर यह सवाल उठ रहा है कि क्या वह शक्तिशाली कॉरपोरेट समूहों द्वारा पत्रकारों पर कानूनी दबाव को रोकने के लिए पर्याप्त कदम उठा रही है।

प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में गिरती रैंकिंग

आरएसएफ की रिपोर्ट के मुताबिक, Press Freedom Index में भारत की रैंकिंग 151वें स्थान तक फिसल चुकी है। संस्था का आकलन है कि भारत में सच लिखने, दिखाने और बोलने की आज़ादी लगातार सिमट रही है। पत्रकारों के खिलाफ़ मुकदमे, छापे, गिरफ्तारी और ऑनलाइन उत्पीड़न—ये सभी कारण इस गिरावट के पीछे बताए गए हैं।

पत्रकार संगठनों की प्रतिक्रिया

देश और विदेश के पत्रकार संगठनों ने अडानी समूह पर लगे आरोपों को गंभीर बताते हुए सरकार से मांग की है कि SLAPP मुकदमों के खिलाफ़ स्पष्ट कानून बनाया जाए। उनका कहना है कि बिना भय के रिपोर्टिंग लोकतंत्र की बुनियाद है और इसे कॉरपोरेट ताक़त के ज़रिये कुचलने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

अडानी समूह का पक्ष

अडानी समूह पहले भी ऐसे आरोपों को खारिज करता रहा है और कहा है कि वह केवल “झूठी और मानहानिकारक” खबरों के खिलाफ़ कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल करता है। समूह का दावा है कि उसकी कार्रवाइयों का उद्देश्य पत्रकारों को डराना नहीं, बल्कि तथ्यों की रक्षा करना है।

लोकतंत्र की कसौटी

आरएसएफ की रिपोर्ट ने भारत में मीडिया की आज़ादी को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। सवाल यह नहीं है कि कौन सा कॉरपोरेट समूह सही या गलत है, बल्कि यह है कि क्या पत्रकार बिना डर के सत्ता और पूंजी—दोनों से सवाल पूछ सकते हैं। लोकतंत्र में यही आज़ादी असली कसौटी मानी जाती है। यह रिपोर्ट Reporters Without Borders की सार्वजनिक रिपोर्ट और मीडिया संगठनों की प्रतिक्रियाओं पर आधारित है। संबंधित पक्षों का पक्ष भी शामिल किया गया है।

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