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WATCH VIDEO — संसद में लोकतंत्र की हत्या: राहुल गांधी का माइक बंद कर चुप कराया गया, सत्ता का बहस से इंकार

एबीसी नेशनल न्यूज | 4 फरवरी 2026

नई दिल्ली। मंगलवार को संसद के भीतर जो कुछ घटित हुआ, वह किसी साधारण संसदीय अव्यवस्था का मामला नहीं था, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के माथे पर लगाया गया एक गहरा, शर्मनाक और खतरनाक धब्बा था। जब नेता विपक्ष राहुल गांधी अपनी बात रखने के लिए खड़े हुए, तब सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों को उनकी आवाज़ इतनी असहज लगी कि उसे सिरे से दबा देने का फ़ैसला कर लिया गया। कैमरों के सामने, संविधान की शपथ लेकर बैठे सदन में सवाल पूछना अपराध बना दिया गया और असहमति को अनुशासनहीनता का नाम देकर कुचलने की कोशिश की गई।

इस घटनाक्रम को और भी ज़्यादा अलोकतांत्रिक और भयावह बनाता है वह दृश्य, जब राहुल गांधी के बोलते रहने के दौरान ही चेयरमैन ने जानबूझकर अन्य सांसदों के नाम पुकारने शुरू कर दिए। यह कोई प्रक्रियागत भ्रम नहीं था, न ही कोई तकनीकी चूक। यह एक सोची-समझी और सुनियोजित रणनीति थी—नेता विपक्ष की आवाज़ को बीच में ही दबा देने की। लेकिन इस साज़िश पर उस वक्त करारा तमाचा पड़ा, जब INDIA गठबंधन के सांसदों ने नाम पुकारे जाने के बावजूद बोलने से साफ़ इनकार कर दिया। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि वे विपक्ष की आवाज़ कुचलने के इस अलोकतांत्रिक खेल का हिस्सा नहीं बनेंगे।

इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे घटनाक्रम की मंशा को पूरी तरह बेनकाब कर दिया। विपक्ष को चुप कराने के बाद अंततः सत्ता पक्ष के एक सांसद का नाम पुकारा गया—और उन्हें बिना किसी हिचक के बोलने की अनुमति दे दी गई। यानी संसद को बहस और विमर्श का मंच नहीं, बल्कि सत्ता के एकतरफ़ा प्रचार का माइक बना दिया गया। यह दृश्य अपने आप में चीख-चीखकर बता रहा था कि किस तरह लोकतांत्रिक संस्थाओं को सत्ता के हित में मोड़ा जा रहा है।

यह कोई सामान्य संसदीय खींचतान नहीं थी। यह खुला तानाशाही प्रदर्शन था। यह संदेश देने की कोशिश थी कि सवाल पूछने वाला चुप रहेगा और सत्ता बिना जवाब दिए बोलती रहेगी। नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार जिस तरह संसद को विपक्ष-विहीन बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है, वह लोकतंत्र की जड़ों पर सीधा और सुनियोजित हमला है। जब नेता विपक्ष को बोलने का अधिकार नहीं, तो आम नागरिक की आवाज़ की कीमत आखिर क्या रह जाती है?

मंगलवार को संसद में जो कुछ हुआ, वैसा दृश्य भारतीय संसदीय इतिहास में शायद ही कभी देखा गया हो। नियमों की आड़ में विपक्ष को चुप कराना, बहस को रोकना और सत्ता पक्ष को खुली छूट देना—ये सब मिलकर एक बेहद खतरनाक परंपरा की नींव डालते हैं। यह केवल एक दिन की घटना नहीं है, बल्कि उस सोच का प्रतिबिंब है जो लोकतंत्र को सवालों से मुक्त और सत्ता को जवाबदेही से ऊपर रखना चाहती है।

यह घटना शर्मनाक भी है, खतरनाक भी और एक गंभीर चेतावनी भी। चेतावनी इस बात की कि अगर संसद के भीतर आवाज़ें यूँ ही दबाई जाती रहीं, तो वे सड़कों पर गूंजेंगी। लोकतंत्र की आत्मा को कुचलने की हर कोशिश इतिहास के पन्नों में दर्ज होती है—और मंगलवार का यह दिन भी भारतीय लोकतंत्र की उस काली सूची में शामिल हो गया है, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ गुस्से और सवालों के साथ याद करेंगी।

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