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WATCH VIDEO — ट्रंप का ऐलान, मोदी का जश्न—राहुल का आरोप: प्रधानमंत्री “कॉम्प्रोमाइज्ड”

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इंडिया–यूएस ट्रेड डील: जीत नहीं, सीधा सरेंडर

नई दिल्ली। यह कोई साधारण व्यापार समझौता नहीं है, यह देश की गरिमा, किसानों की रोज़ी और बाजार की रीढ़ से जुड़ा सवाल है। कांग्रेस नेता Rahul Gandhi ने जब यह कहा कि “The Prime Minister of India is compromised”, तो यह एक लाइन नहीं थी—यह उस पूरी कहानी का निचोड़ था जो आज भारत–अमेरिका ट्रेड डील के नाम पर देश के सामने रखी जा रही है। सवाल सीधा है: जब ऐलान वॉशिंगटन से होता है और नई दिल्ली ताली बजाती दिखती है, तो यह जीत कैसे हो सकती है? यह समझौता क्यों संसद से दूर रखा गया? और क्यों हर बड़ी जानकारी हमें अपने प्रधानमंत्री से नहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति से मिल रही है?

फरवरी 2026 की यह डील आते ही देश दो हिस्सों में बंट गया। सरकार और NDA इसे “ऐतिहासिक उपलब्धि” बता रहे हैं, मंच सज रहे हैं, अभिनंदन हो रहे हैं। दूसरी तरफ विपक्ष, किसान संगठन और छोटे व्यापारी पूछ रहे हैं—इसमें भारत को मिला क्या? अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने एकतरफा ऐलान कर दिया कि भारतीय सामान पर टैरिफ 25% से घटकर 18% होगा। सुनने में राहत लगती है, लेकिन सच यह है कि इससे पहले यही टैरिफ 2–3% तक रहा है, जिसे पहले बढ़ाया गया और अब घटाकर “उपकार” बताया जा रहा है। बदले में भारत ने अमेरिकी कृषि, डेयरी और कई संवेदनशील उत्पादों पर टैरिफ लगभग शून्य कर दिया। सवाल उठता है—यह सौदा बराबरी का है या मजबूरी का?

प्रधानमंत्री Narendra Modi ने इस डील को “मेड इन इंडिया” की जीत बताकर अमेरिकी राष्ट्रपति का धन्यवाद किया और इसे 1.4 अरब लोगों के नाम कर दिया। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जब भारतीय बाजार अमेरिकी किसानों और कंपनियों के लिए खुल रहा है, तब हमारे किसान और डेयरी सेक्टर किस भरोसे खड़े रहेंगे? सस्ते आयात का सीधा मतलब है—देशी उत्पाद दबाव में, दाम टूटेंगे और छोटे उत्पादक पिसेंगे। यह ‘आत्मनिर्भर भारत’ नहीं, यह बाज़ार को बाहरी ताकतों के सामने खोल देने का फैसला है।

विपक्ष का आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया गोपनीयता में की गई। न संसद में बहस, न राज्यों से राय, न किसानों से बातचीत। कांग्रेस का कहना है कि डील की शर्तें पहले से तय थीं और भारत को बस मानना था। इसी संदर्भ में राहुल गांधी ने तीखे शब्दों में कहा कि प्रधानमंत्री निर्णय लेने की स्थिति में नहीं दिखते। उनका तर्क है कि जब शर्तें बाहर से तय हों और सरकार सवालों से भागे, तो देश को शक करने का हक है। सरकार इन आरोपों को नकारती रही है, लेकिन जवाब देने से बचती भी दिखी है।

सोशल मीडिया पर जनता का गुस्सा खुलकर सामने आ रहा है। मीम्स, वीडियो और पोस्ट में एक लाइन बार-बार घूम रही है—“मोदी: बर्बादियों का जश्न मना रहे हैं, ट्रंप: अमेरिका फर्स्ट बनाते जा रहे हैं!” यह मज़ाक नहीं, यह उस डर की आवाज़ है कि कहीं किसानों की मेहनत और छोटे व्यापारियों की दुकानें इस डील की कीमत न बन जाएँ। अमेरिकी कृषि सचिवालय और नेताओं के बयान खुलेआम कह रहे हैं कि इस डील से अमेरिकी किसानों को फायदा होगा और भारत उनका बड़ा बाजार बनेगा। सवाल फिर वही—अगर अमेरिका जीत रहा है, तो भारत की जीत कहाँ है?

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता K C Venugopal ने साफ कहा कि भारत–अमेरिका व्यापार संबंधों के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि समझौते की घोषणा अमेरिका ने की और भारत चुप रहा। यह सिर्फ व्यापार नहीं, कूटनीति का भी सवाल है। जब हर बड़ी सूचना बाहर से आए और देश के प्रधानमंत्री से पहले विदेशी राष्ट्रपति बोलें, तो संप्रभुता पर सवाल उठना लाज़मी है।

नतीजा साफ है। यह डील अब सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं रही। यह किसानों, व्यापारियों और आम आदमी के भविष्य की परीक्षा बन गई है। एक तरफ सरकार का जश्न है, दूसरी तरफ देश का डर। सच्चाई तभी सामने आएगी जब समझौते की हर शर्त, हर छूट और हर जोखिम संसद के पटल पर रखे जाएंगे। तब तक सवाल जिंदा रहेंगे—यह जीत थी या सरेंडर? और अगर सच में प्रधानमंत्री “कॉम्प्रोमाइज्ड” नहीं हैं, तो सरकार को यह साबित करना होगा—शब्दों से नहीं, पारदर्शिता से

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