एबीसी नेशनल न्यूज | 2 फरवरी 2026
नई दिल्ली। लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने संसद के भीतर मोदी सरकार पर सीधा और तीखा हमला बोलते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी खुद को आतंकवाद के खिलाफ सबसे मजबूत ताकत बताती है, लेकिन सच्चाई यह है कि सरकार एक किताब के एक Quote से डर जाती है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि उन्हें संसद में पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की किताब Four Stars of Destiny से एक अंश पढ़ने तक की अनुमति नहीं दी गई, क्योंकि वह अंश सरकार के “मजबूत नेतृत्व” के दावे को बेनकाब करता है। भारत-चीन की सीमा पर जो हुआ है, वो सेना का हर जवान जानता है। लेकिन मोदी सरकार ये सच्चाई देश की जनता से छिपाना चाहती है।
राहुल गांधी ने कहा कि सवाल किसी किताब का नहीं है, सवाल यह है कि सरकार संसद में सच से क्यों भाग रही है। उन्होंने पूछा कि अगर एक पूर्व आर्मी चीफ द्वारा लिखी गई बातों में कुछ भी गलत है, तो सरकार उसका खंडन करे, लेकिन संसद में चर्चा रोकना यह दिखाता है कि सत्ता सच का सामना करने से डर रही है। उन्होंने इसे संसद की गरिमा और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सीधा हमला बताया।
लद्दाख की वह रात, जो सरकार को असहज करती है
राहुल गांधी जिस हिस्से को Quote करना चाहते थे, वह अगस्त 2020 की उस रात का विवरण है, जब पूर्वी लद्दाख के रेचिन ला क्षेत्र में हालात बेहद विस्फोटक हो गए थे। किताब के अनुसार, 31 अगस्त 2020 की रात भारतीय सेना को जानकारी मिली कि चार चीनी टैंक एक खड़ी पहाड़ी के रास्ते भारतीय ठिकानों की ओर बढ़ रहे हैं। यह वही इलाका था, जहां भारतीय सेना ने कुछ ही घंटे पहले रणनीतिक ऊंचाइयों पर कब्जा किया था और जहां हर मीटर जमीन सैन्य दबदबे का सवाल थी।
किताब बताती है कि हालात की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल नरवणे ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से लगातार संपर्क किया। उनका सवाल साफ और सीधा था—“मेरे लिए आदेश क्या हैं?” लेकिन घंटों तक राजनीतिक नेतृत्व से कोई स्पष्ट निर्देश नहीं मिला।
‘गोली मत चलाना’ और राजनीतिक असमंजस
नरवणे अपनी किताब में लिखते हैं कि मौजूदा प्रोटोकॉल के तहत उन्हें तब तक फायरिंग न करने के निर्देश थे, जब तक ऊपर से अनुमति न मिले। लेकिन समस्या यह थी कि ऊपर से कोई साफ अनुमति या आदेश आ ही नहीं रहा था, जबकि चीनी टैंक लगातार आगे बढ़ते जा रहे थे। हालात इतने नाज़ुक थे कि एक भी गलत फैसला सीधे युद्ध में बदल सकता था, लेकिन राजनीतिक स्तर पर स्पष्टता का घोर अभाव दिखा।
किताब में यह भी दर्ज है कि फील्ड कमांडर आर्टिलरी फायर के लिए पूरी तरह तैयार थे और आदेश का इंतज़ार कर रहे थे। पाकिस्तान के साथ एलओसी पर जहां स्थानीय कमांडरों को बिना ऊपर पूछे फायरिंग का अधिकार है, वहीं चीन के मामले में फैसले को ऊपर टालते रहने की नीति ने सेना को असमंजस में डाल दिया।
“जो उचित समझो, वह करो” — नेतृत्व या जिम्मेदारी से पलायन?
सबसे गंभीर और विवादास्पद बिंदु वह है, जहां किताब के अनुसार रात करीब 10:30 बजे रक्षा मंत्री ने वापस फोन किया और बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात हो चुकी है। प्रधानमंत्री का निर्देश सिर्फ एक वाक्य में था—“जो उचित समझो, वह करो।”
राहुल गांधी ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि क्या यही निर्णायक नेतृत्व है? उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दे पर अंतिम जिम्मेदारी लेने के बजाय, राजनीतिक नेतृत्व ने पूरा बोझ सेना के कंधों पर डाल दिया। नरवणे के शब्दों में, उस वक्त उन्हें “गर्म आलू” थमा दिया गया था और पूरी जिम्मेदारी अकेले उन्हीं पर छोड़ दी गई।
संसद में सवाल, सरकार की चुप्पी
राहुल गांधी ने कहा कि यह किताब किसी विपक्षी नेता की नहीं, बल्कि भारत के पूर्व सेना प्रमुख की है, और अगर सरकार को उसमें लिखी बातें असहज करती हैं, तो यह सरकार की कमजोरी को दिखाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार राष्ट्रवाद के नारे तो ज़ोर-शोर से लगाती है, लेकिन सच सामने आते ही असहज, असहिष्णु और रक्षात्मक हो जाती है।
राहुल गांधी के इस बयान के बाद सदन में भारी हंगामा देखने को मिला, लेकिन सरकार की ओर से न तो किताब में उठाए गए सवालों पर कोई ठोस जवाब आया और न ही कोई स्पष्ट सफाई। विपक्ष का कहना है कि यह मामला अब सिर्फ एक Quote रोकने का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसलों में जवाबदेही, साहस और नेतृत्व की कमी का प्रतीक बन चुका है।





