नई दिल्ली। भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने केंद्रीय बजट 2026-27 को सरकार की नीतिगत असंवेदनशीलता और मजदूर-विरोधी सोच का दस्तावेज़ करार दिया है। संघ का कहना है कि सरकार एक बार फिर विकास के बड़े-बड़े दावे करती दिखी, लेकिन देश की रीढ़ कहे जाने वाले कामगारों की रोज़ी-रोटी, मज़दूरी और सामाजिक सुरक्षा पर बजट पूरी तरह विफल रहा। बीएमएस के मुताबिक यह बजट “विकसित भारत” के नारे को तो दोहराता है, लेकिन उस भारत को बनाने वाले मजदूरों के जीवन में कोई ठोस बदलाव नहीं लाता।
संघ ने कहा कि बजट में बुनियादी ढांचे, पूंजीगत निवेश, उद्योगों और कॉरिडोर परियोजनाओं की लंबी सूची गिनाई गई है। कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग, टेक्सटाइल पार्क, खेल सामग्री उद्योग, औद्योगिक क्लस्टर, रेल और जलमार्ग—सब कुछ मौजूद है, लेकिन कामगार की जेब, नौकरी की सुरक्षा और भविष्य की चिंता पर सरकार पूरी तरह मौन है। बीएमएस का आरोप है कि सरकार विकास को केवल आंकड़ों और परियोजनाओं में देख रही है, जबकि ज़मीनी हकीकत यह है कि मजदूर आज भी कम मज़दूरी, असुरक्षित नौकरी और महंगाई के दबाव में पिस रहा है।
सामाजिक सुरक्षा के मोर्चे पर सरकार फेल
बीएमएस ने सबसे तीखी आलोचना पीएफ, ईएसआई और बोनस को लेकर की। संघ का कहना है कि इन योजनाओं की सीलिंग सीमा में कोई बढ़ोतरी न करना सीधे तौर पर मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा से बाहर धकेलने जैसा है। सरकार अगर सच में श्रमिक कल्याण को लेकर गंभीर होती, तो इन सीमाओं को बढ़ाकर अधिक से अधिक कामगारों को सुरक्षा के दायरे में लाती। लेकिन बजट में इस पर चुप्पी यह दिखाती है कि सरकार की प्राथमिकताओं में मजदूर सबसे नीचे हैं।
महिला योजना कर्मियों के साथ लगातार अन्याय
आंगनवाड़ी, आशा और मिड-डे मील जैसी योजनाओं से जुड़ी लाखों महिला कर्मियों को लेकर भी बजट पूरी तरह निराशाजनक रहा। बीएमएस ने कहा कि ये महिलाएं वर्षों से सरकारी योजनाओं की रीढ़ बनी हुई हैं, लेकिन उन्हें आज तक न तो नियमित कर्मचारी का दर्जा मिला, न न्यूनतम मज़दूरी और न ही सामाजिक सुरक्षा। मानदेय में कोई बढ़ोतरी न करना सरकार की उस सोच को उजागर करता है, जिसमें जमीनी स्तर पर काम करने वाली महिलाओं की मेहनत की कोई कीमत नहीं।
पेंशनधारकों की पीड़ा अनसुनी
ईपीएस-95 के तहत न्यूनतम पेंशन में कोई बढ़ोतरी न करना सरकार की संवेदनहीनता का एक और उदाहरण है। हजारों सेवानिवृत्त कर्मचारी आज भी बेहद कम पेंशन में गुज़ारा करने को मजबूर हैं। बीएमएस ने सवाल उठाया कि जब सरकार अन्य योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च कर सकती है, तो ₹1000 की न्यूनतम पेंशन बढ़ाने में सरकार के हाथ क्यों कांपते हैं? यह सवाल सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक भी है।
असंगठित और गिग वर्कर्स फिर ठगे गए
देश की लगभग 90 प्रतिशत श्रमशक्ति असंगठित क्षेत्र में काम करती है। गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन बजट में उनके लिए कोई ठोस सामाजिक सुरक्षा कोष नहीं बनाया गया। बीएमएस का कहना है कि ई-श्रम जैसे पंजीकरण उपाय दिखावटी हैं, जब तक उनके पीछे वास्तविक सुरक्षा और लाभ न हों। यह बजट असंगठित क्षेत्र के लिए एक और खोया हुआ मौका साबित हुआ है।
नौकरी सुरक्षा को कमजोर करने की कोशिश
बीएमएस ने चेतावनी दी कि निजीकरण, ठेकेदारी और आउटसोर्सिंग को बढ़ावा देने वाली सरकारी नीतियां, यदि कानूनी नौकरी सुरक्षा और श्रम संरक्षण के बिना लागू की गईं, तो हालात और बिगड़ेंगे। इससे न केवल बेरोज़गारी बढ़ेगी, बल्कि कम मज़दूरी और श्रमिक शोषण को भी खुली छूट मिल जाएगी।
सरकारी कर्मचारियों में भी निराशा
संघ ने कहा कि बजट में आठवें वेतन आयोग और एनपीएस में सार्थक सुधारों पर चुप्पी साध ली गई है। इससे साफ है कि सरकार सरकारी कर्मचारियों की मांगों और समस्याओं को भी गंभीरता से नहीं ले रही, जिसका असर व्यापक असंतोष के रूप में सामने आ रहा है।
बीएमएस : विकास बिना मजदूर के संभव नहीं
भारतीय मजदूर संघ ने साफ शब्दों में कहा है कि केंद्रीय बजट 2026-27 सरकार की नाकामी का प्रतीक है, जो विकास की बात तो करता है, लेकिन मजदूर को भूल जाता है। संघ ने चेतावनी दी कि जब तक नीतियों के केंद्र में कामगार की मज़दूरी, सुरक्षा और सम्मान नहीं होगा, तब तक “विकसित भारत” सिर्फ एक नारा बनकर रह जाएगा।




