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जे.पी. नड्डा: तेलंगाना में यूरिया की बढ़ती खपत गंभीर संकेत, कृषि नीति में बदलाव की जरूरत

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तेलंगाना में बढ़ती यूरिया की खपत पर जताई चिंता, कृषि व्यवस्था के लिए बताया खतरा

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने तेलंगाना में यूरिया और अन्य रासायनिक उर्वरकों की अत्यधिक खपत को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि इस रुझान से राज्य की कृषि व्यवस्था और मिट्टी की दीर्घकालिक उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। एक सार्वजनिक कार्यक्रम में बोलते हुए नड्डा ने चेतावनी दी कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो आने वाले वर्षों में भूमि की उर्वरता घट सकती है, जिससे किसानों की आय और उत्पादन दोनों प्रभावित होंगे।

रासायनिक खेती से बिगड़ रहा संतुलन, प्राकृतिक खेती को बताया विकल्प

जेपी नड्डा ने अपने वक्तव्य में यह स्पष्ट किया कि यूरिया और रासायनिक उर्वरकों की अंधाधुंध खपत न केवल मिट्टी और फसलों को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि मानव स्वास्थ्य के लिए भी चुनौती बनती जा रही है। उन्होंने प्राकृतिक खेती, जैविक खाद और मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार, केंद्र सरकार पहले से ही प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए कई योजनाएं चला रही है, लेकिन राज्य सरकारों को भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

आँकड़ों के आईने में संकट: तेलंगाना में राष्ट्रीय औसत से ज़्यादा यूरिया उपयोग

वर्तमान में तेलंगाना में प्रति हेक्टेयर यूरिया उपयोग राष्ट्रीय औसत से अधिक है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से मिट्टी की जैविक संरचना नष्ट हो रही है, जिससे फसलें अधिक उर्वरक मांगने लगती हैं। यह एक ‘उर्वरक जाल’ बन जाता है, जिसमें किसान फँसते चले जाते हैं— लागत बढ़ती है, लेकिन मुनाफा घटता है। नड्डा का बयान इसी वैज्ञानिक चिंता को रेखांकित करता है कि अब नीति स्तर पर संतुलन और स्थायित्व को प्राथमिकता देनी होगी।

किसानों की आत्मनिर्भरता की राह: शिक्षा, तकनीक और समर्थन ज़रूरी

जेपी नड्डा ने यह भी कहा कि केवल चेतावनी देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि किसानों को विकल्प भी देना होगा। इसके लिए ज़रूरी है कि कृषि विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और कृषि विज्ञान केंद्रों को गाँव-गाँव तक सक्रिय किया जाए। उन्होंने तकनीकी प्रशिक्षण, जैविक खेती की कार्यशालाएँ और गो आधारित कृषि के मॉडल को तेज़ी से बढ़ाने की मांग की। इसके अलावा, बाजार में जैविक उत्पादों की बेहतर कीमत और वितरण व्यवस्था को भी सुधारने की आवश्यकता बताई।

कृषि सुधारों की नीतिगत दिशा: केवल उत्पादन नहीं, प्रकृति संग समन्वय

जेपी नड्डा का यह बयान न सिर्फ तेलंगाना की स्थिति की आलोचना है, बल्कि एक व्यापक नीति संकेत भी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि केंद्र सरकार अब कृषि को केवल उत्पादन की दृष्टि से नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन, किसान कल्याण और भूमि सुरक्षा के आधार पर देखना चाहती है। रासायनिक खेती की जगह प्राकृतिक और टिकाऊ खेती की ओर बढ़ना ही कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का दीर्घकालिक समाधान है।

तेलंगाना की सरकार और किसानों के लिए यह बयान एक चेतावनी है, लेकिन साथ ही अवसर भी— कृषि की दिशा बदलने का और मिट्टी को बचाने का।

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