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बजट ऐसा लाओ कि मार्केट क्रैश हो जाए : कांग्रेस

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एबीसी नेशनल न्यूज | 1 फरवरी 2026

आर्थिक सर्वेक्षण नज़रअंदाज़, आम आदमी से जुड़े खर्चों में बड़ी कटौती – पी. चिदंबरम

नई दिल्ली। केंद्रीय बजट 2026–27 को लेकर कांग्रेस ने मोदी सरकार और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर जोरदार हमला बोला है। कांग्रेस ने बजट को फीका, निराशाजनक और खोखला बताते हुए कहा कि यह बजट देश की असली आर्थिक समस्याओं से आंख चुराता है। पार्टी ने व्यंग्य करते हुए कहा— “बजट ऐसा लाओ कि मार्केट क्रैश हो जाए”।
बजट पेश होते ही शेयर बाजार में भारी गिरावट देखने को मिली। सेंसेक्स और निफ्टी में तेज़ गिरावट को कांग्रेस ने सरकार की नाकाम आर्थिक सोच का नतीजा बताया। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि बाजार की यह प्रतिक्रिया बताती है कि बजट निवेशकों और आम लोगों—दोनों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा।

कांग्रेस का आरोप है कि बजट में बेरोज़गारी, किसान संकट, महंगाई, मैन्युफैक्चरिंग की सुस्ती और घरेलू मांग जैसी गंभीर चुनौतियों पर कोई ठोस समाधान नहीं दिया गया। पार्टी के मुताबिक सरकार सिर्फ दावों और बड़े-बड़े शब्दों में उलझी रही, जबकि ज़मीन पर हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं।

पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने बजट 2026–27 को लेकर बेहद कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि संसद में वित्त मंत्री का भाषण सुनकर बजट पर नज़र रखने वाला हर लेखक, टिप्पणीकार और अर्थशास्त्र का हर छात्र हैरान रह गया होगा। उनके मुताबिक बजट सिर्फ आय-व्यय का सालाना हिसाब नहीं होता, बल्कि उसे देश की बड़ी आर्थिक चुनौतियों पर साफ़ दिशा दिखानी चाहिए थी—जो हाल ही में आए आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 में साफ तौर पर गिनाई गई थीं।

चिदंबरम ने संदेह जताया कि सरकार और वित्त मंत्री ने आर्थिक सर्वेक्षण पढ़ा भी है या नहीं। उनका कहना है कि अगर पढ़ा भी गया, तो उसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया। बजट भाषण, एक बार फिर, योजनाओं और अक्रोनिम्स की भरमार बनकर रह गया, जबकि असली समस्याएं जस की तस रहीं।

उन्होंने बताया कि आर्थिक सर्वेक्षण और विशेषज्ञों ने कम से कम दस बड़ी चुनौतियों की पहचान की थी—जैसे अमेरिका द्वारा लगाए गए दंडात्मक टैरिफ, वैश्विक व्यापार संघर्ष, चीन के साथ बढ़ता व्यापार घाटा, निजी निवेश की सुस्ती, एफडीआई को लेकर अनिश्चितता, विदेशी निवेश का बाहर जाना, ऊँचा राजकोषीय घाटा, महंगाई और वास्तविक खर्चों के बीच का अंतर, एमएसएमई का बंद होना, युवाओं में बेरोज़गारी और शहरों में बिगड़ता बुनियादी ढांचा। चिदंबरम के अनुसार इनमें से किसी भी मुद्दे को बजट भाषण में गंभीरता से नहीं उठाया गया।

पूर्व वित्त मंत्री ने बजट के आंकड़ों पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि 2025–26 में वित्त प्रबंधन बेहद कमजोर रहा। राजस्व प्राप्तियाँ लक्ष्य से कम रहीं और कुल व्यय भी घटा दिया गया। सबसे गंभीर बात यह है कि पूंजीगत खर्च में बड़ी कटौती की गई। इसके साथ ही राजस्व व्यय में की गई कटौतियाँ सीधे-सीधे आम लोगों से जुड़े क्षेत्रों पर पड़ीं।

ग्रामीण विकास, शहरी विकास, सामाजिक कल्याण, कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अहम क्षेत्रों में हजारों करोड़ रुपये खर्च नहीं किए गए। चिदंबरम ने खास तौर पर जल जीवन मिशन का ज़िक्र करते हुए कहा कि जिस योजना का खूब प्रचार हुआ, उस पर खर्च 67 हजार करोड़ रुपये से घटाकर सिर्फ 17 हजार करोड़ रुपये कर दिया गया, जो बेहद चिंताजनक है।

राजकोषीय अनुशासन के मोर्चे पर भी उन्होंने सरकार को घेरा। उनका कहना है कि कई महीनों की तैयारी के बावजूद राजकोषीय घाटा 4.4 प्रतिशत पर ही अटका हुआ है और अगले साल इसमें सिर्फ 0.1 प्रतिशत की मामूली कमी का अनुमान है। इसे किसी भी तरह से साहसिक या दूरदर्शी आर्थिक सुधार नहीं कहा जा सकता।

आयकर से जुड़े बदलावों पर टिप्पणी करते हुए चिदंबरम ने कहा कि कुछ छोटे सुधारों का स्वागत किया जा सकता है, लेकिन देश की बड़ी आबादी आयकर के दायरे में ही नहीं आती। आम आदमी पर असली बोझ अप्रत्यक्ष करों और रोज़मर्रा के खर्चों का है, जहां बजट ने बहुत सीमित राहत दी है।

कुल मिलाकर कांग्रेस और पी. चिदंबरम का निष्कर्ष साफ है—बजट 2026–27 न तो आर्थिक रणनीति की कसौटी पर खरा उतरता है और न ही आर्थिक नेतृत्व का भरोसा देता है। विपक्ष का कहना है कि यह बजट आम आदमी की परेशानियों को हल करने के बजाय उन्हें और गहरा करता है, और यही वजह है कि देश के बाजार से लेकर ज़मीन तक, हर जगह निराशा की आवाज़ सुनाई दे रही है।

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