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अमेरिकी दबाव के बाद भारत–यूरोप का बड़ा दांव: 27 ट्रिलियन डॉलर से बदलेगा व्यापार का खेल

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प्रो शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री | नई दिल्ली 30 जनवरी 2026

27 जनवरी 2026 को भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच जिस मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की घोषणा हुई, उसे दोनों पक्षों का अब तक का सबसे बड़ा व्यापारिक करार बताया जा रहा है। यह बात सही भी है, लेकिन पूरी सच्चाई बस इतनी नहीं है। यह समझौता केवल टैक्स घटाने, बाजार खोलने या आयात–निर्यात बढ़ाने तक सीमित नहीं है। दरअसल यह उस दबाव का नतीजा है, जो बदलती वैश्विक राजनीति और अमेरिका की सख्त व्यापार नीति ने भारत और यूरोप दोनों पर बनाया। यह समझौता करीब 2 अरब लोगों को जोड़ने वाला है और लगभग 27 ट्रिलियन डॉलर की संयुक्त आर्थिक ताकत खड़ी करता है। आज की तारीख में भारत और यूरोप के बीच सालाना व्यापार करीब 136.5 अरब डॉलर का है। आंकड़ा बड़ा लगता है, लेकिन इतने विशाल बाजार के हिसाब से यह कम ही माना जाएगा। यही कमी दोनों पक्षों को इस समझौते की ओर ले आई।

असल में यह कोई “सब जीतें” वाली कहानी नहीं है। यह फायदे के नए बंटवारे की कहानी है, जहां कुछ को ज्यादा मिलेगा और कुछ को नुकसान भी उठाना पड़ेगा। छोटे निर्यात पर निर्भर देशों की हिस्सेदारी घटेगी और भारत व यूरोप जैसे बड़े आर्थिक समूह ज्यादा मजबूत होंगे। इसका असर दक्षिण एशिया से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक लंबे समय तक दिखाई देगा।

इस समझौते को उस पृष्ठभूमि में समझना जरूरी है, जहां अमेरिका ने एक बार फिर व्यापार को दबाव का हथियार बना लिया है। डोनाल्ड ट्रंप की सत्ता में वापसी के बाद अमेरिका ने अगस्त 2025 में भारत के सामानों पर 50 प्रतिशत तक भारी टैरिफ लगा दिए। इसका सीधा असर यह हुआ कि भारत के करीब 36 अरब डॉलर के निर्यात को झटका लगा, जो देश की जीडीपी का लगभग एक प्रतिशत था। यूरोप की हालत भी कुछ खास बेहतर नहीं रही। यूरोपीय संघ के निर्यात पर अमेरिका ने 15 प्रतिशत टैरिफ लगाया और साथ ही यूरोप पर अमेरिका में 600 अरब डॉलर का निवेश और 750 अरब डॉलर की ऊर्जा खरीद का दबाव बनाया। यूरोप के कई नीति निर्माताओं ने इसे अंदरखाने “आर्थिक दबाव” ही माना।

इसी माहौल में भारत और यूरोप ने अमेरिका से बाहर अपने लिए नए रास्ते तलाशने शुरू किए। भारत–यूरोप मुक्त व्यापार समझौता उसी कोशिश का नतीजा है, ताकि दोनों पक्ष एक-दूसरे के बाजार में अपने नुकसान की भरपाई कर सकें और भविष्य के झटकों से खुद को बचा सकें।

अनुमानों के मुताबिक इस समझौते से भारत को करीब 75 अरब डॉलर का अतिरिक्त निर्यात फायदा हो सकता है, जबकि यूरोप का भारत को निर्यात 2032 तक दोगुना हो सकता है। अगले दस सालों में कुल व्यापार 250 से 300 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। लेकिन यह फायदा सभी को बराबर नहीं मिलेगा।

समझौते के तहत भारत यूरोप से आने वाले 96.6 प्रतिशत सामानों पर टैक्स खत्म या काफी कम करेगा। इससे यूरोपीय कंपनियों को हर साल करीब 4 अरब यूरो की बचत होगी। इसके बदले यूरोप भारत के 99 प्रतिशत से ज्यादा उत्पादों को लगभग टैक्स फ्री अपने बाजार में जगह देगा। इनमें से 90 प्रतिशत उत्पादों पर यह छूट तुरंत लागू होगी।

यह असमानता जानबूझकर रखी गई है। भारत को बड़े पैमाने पर उत्पादन और रोजगार बढ़ाने का मौका मिलेगा, जबकि यूरोप को अमेरिका और चीन पर निर्भरता कम करने का भरोसेमंद विकल्प मिलेगा। लेकिन बांग्लादेश, वियतनाम, कंबोडिया और श्रीलंका जैसे छोटे देशों को नुकसान होगा, जिनकी प्रतिस्पर्धा अब कमजोर पड़ सकती है।

सबसे पहला बड़ा असर कपड़ा उद्योग में दिखेगा। यूरोप हर साल 263 अरब डॉलर से ज्यादा का कपड़ा आयात करता है, लेकिन भारत का हिस्सा अभी सिर्फ 7.2 अरब डॉलर यानी करीब 2.7 प्रतिशत है। बांग्लादेश और वियतनाम को टैक्स में मिली छूट की वजह से अब तक बढ़त मिली हुई थी। जैसे ही यूरोप में 11–12 प्रतिशत टैक्स हटेगा, भारतीय कपड़ा सस्ता और ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो जाएगा। अनुमान है कि अगले कुछ सालों में भारत का कपड़ा निर्यात 20 से 25 प्रतिशत सालाना की रफ्तार से बढ़ सकता है।

इसका असर केवल कारोबार तक सीमित नहीं रहेगा। कपड़ा उद्योग देश के 342 जिलों से जुड़ा है—तिरुप्पुर, सूरत, मुरादाबाद, भदोही और करूर जैसे इलाके सीधे प्रभावित होंगे। माना जा रहा है कि इससे 60 से 70 लाख तक रोजगार पैदा हो सकते हैं। ऐसे समझौते बहुत कम होते हैं, जिनका असर सीधे जमीन पर नौकरियों से जुड़ता हो।

दवा क्षेत्र में भी भारत को बड़ा मौका मिल सकता है। अभी तक यूरोप में भारतीय दवाओं की मौजूदगी नियमों और प्रक्रियाओं की वजह से सीमित थी। 2024 में भारत ने यूरोप को सिर्फ 2.95 अरब डॉलर की दवाएं भेजीं, जो वहां के बाजार का महज 2.2 प्रतिशत है। अब टैक्स हटने और नियम आसान होने से भारतीय जेनेरिक दवाओं की राह खुलेगी। इससे यूरोप में दवाएं सस्ती होंगी और भारत को हर साल 5 से 8 अरब डॉलर तक का अतिरिक्त निर्यात मिल सकता है।

गहने, ज्वेलरी और चमड़ा उद्योग में भी टैक्स हटने से भारत को फायदा होगा। सूरत और जयपुर जैसे शहरों की ज्वेलरी यूरोप में ज्यादा प्रतिस्पर्धी होगी। चमड़ा और फुटवियर पर 17 प्रतिशत तक टैक्स हटने से तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के उद्योगों को बढ़त मिलेगी।

समुद्री उत्पादों के मामले में भी तस्वीर बदलेगी। अब तक यूरोप में भारतीय समुद्री उत्पादों पर 26 प्रतिशत तक टैक्स लगता था। टैक्स हटने से झींगा, मछली और अन्य समुद्री उत्पादों का निर्यात 2–3 अरब डॉलर सालाना तक बढ़ सकता है।

ऑटोमोबाइल और ऑटो पार्ट्स में भारत को सीमित लेकिन अहम फायदा मिलेगा। 90 प्रतिशत भारतीय ऑटो उत्पादों को यूरोप में तुरंत टैक्स फ्री पहुंच मिलेगी। इससे ऑटो पार्ट्स का निर्यात 1.5 से 2 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। हालांकि इसी के साथ यूरोप की कारें और दूसरे उत्पाद भारत में सस्ते होकर आएंगे, जिससे घरेलू उद्योग और रोजगार पर दबाव पड़ सकता है। यही वजह है कि विशेषज्ञ इस समझौते के हर पहलू पर गहराई से अध्ययन की जरूरत बता रहे हैं।

इस पूरे परिदृश्य में एक बड़ा सवाल BRICS को लेकर भी उठता है। इस साल भारत BRICS का अध्यक्ष है। ऐसे में क्या यह समझौता डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में कोई संकेत देता है? यूरोप और रूस के बीच मौजूदा तनाव को देखते हुए यह आसान नहीं है, लेकिन इतना साफ है कि दुनिया अब वैकल्पिक आर्थिक रास्तों की तलाश में है।

भारत–यूरोप मुक्त व्यापार समझौता अमेरिका के खिलाफ कोई सीधा विरोध नहीं है, बल्कि एक व्यावहारिक रास्ता है। यह बताता है कि जब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अनिश्चितता पैदा करती है, तो बाकी देश मिलकर नए संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं।

भारत के लिए यह समझौता उसे केवल नियम मानने वाले से नियम तय करने वाले देश की ओर ले जाता है। यूरोप के लिए यह अमेरिका और चीन पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता से बचने का तरीका है। वहीं छोटे देशों के लिए यह एक कड़ा संदेश है कि आने वाले समय में सहानुभूति नहीं, बल्कि ताकत और पैमाना तय करेगा कि किसे बाजार मिलेगा और किसे नहीं।

वैश्विक व्यापार टूट नहीं रहा, नए सिरे से ताकतवर देशों के इर्द-गिर्द सिमट रहा है। और इस नए संतुलन में भारत और यूरोप ने तय कर लिया है कि वे हाथ फैलाने के बजाय नियम गढ़ने की मेज पर बैठना चाहते हैं।

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