एबीसी नेशनल न्यूज | 16 जनवरी 2026
आज के भारत की एक ऐसी कड़वी सच्चाई सामने आती है, जो सिर्फ परेशान नहीं करती बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद पर सीधा सवाल खड़ा कर देती है। यह कहानी है नवभारत के दो बच्चों की—उम्र लगभग समान, देश वही, समय वही, लेकिन उनके साथ हुआ व्यवहार बिल्कुल अलग। फर्क सिर्फ इतना है कि एक बच्चा सवाल पूछता है और दूसरा सत्ता के अनुकूल बोलता है। यही फर्क आज के “विश्वगुरु” बनने के दावों वाले भारत की असल तस्वीर को उजागर करता है, जहां सवाल अब विकास का रास्ता नहीं बल्कि अपराध मान लिए गए हैं, और सत्ता की भक्ति को राष्ट्रसेवा का दर्जा दे दिया गया है।
उत्तर प्रदेश के रहने वाले करीब 14 साल के अश्वमीत गौतम एक आम भारतीय किशोर हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर वही सवाल उठाए, जो किसी भी जिम्मेदार नागरिक के मन में उठते हैं—बेहतर शिक्षा कब मिलेगी, युवाओं को रोजगार क्यों नहीं मिल रहा, सड़कें और बुनियादी सुविधाएं कब सुधरेंगी, साफ पानी और नियमित बिजली कब हर घर तक पहुंचेगी, और बच्चों को प्रदूषण से मुक्त हवा कब नसीब होगी। ये सवाल न तो हिंसक थे, न अपमानजनक और न ही किसी को भड़काने वाले। ये एक बच्चे की सरल, मासूम और तार्किक जिज्ञासा थे। लेकिन नवभारत की व्यवस्था ने इन सवालों को विकास का संकेत नहीं, बल्कि खतरा मान लिया। नतीजा यह हुआ कि अश्वमीत के खिलाफ FIR दर्ज कर दी गई और जेल तक की धमकी की बात सामने आई। एक किशोर के सवालों से सत्ता इतनी असहज हो गई कि संवाद की जगह दंड का रास्ता चुन लिया गया। यही वजह है कि यह मामला सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और बड़ी संख्या में लोगों ने इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सीधा हमला बताया।
इसके ठीक उलट तस्वीर दिल्ली के अभिनव अरोड़ा की है, जिन्हें “बाल संत” के रूप में प्रचारित किया जाता है। उनकी उम्र भी कम है, लेकिन उनका कंटेंट आध्यात्मिक प्रवचन, भक्ति और धार्मिक संदेशों से भरा हुआ है। साल 2023 में उन्हें केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी द्वारा भारत का सबसे कम उम्र का आध्यात्मिक वक्ता घोषित कर सम्मानित किया गया। उनके भाषणों और वीडियो में भक्ति के साथ-साथ सत्ता और सरकार के अनुकूल संदेश भी साफ दिखाई देते हैं। नतीजा यह हुआ कि उन्हें मंच मिला, पुरस्कार मिले, पहचान मिली और मीडिया कवरेज भी। यहां तस्वीर बिल्कुल साफ है—जो बच्चा सवाल पूछता है, वह अपराधी की तरह ट्रीट होता है; और जो बच्चा सत्ता के सुर में सुर मिलाता है, वह राष्ट्रसेवक बन जाता है।
यहीं से यह मामला सिर्फ दो बच्चों की तुलना नहीं रह जाता, बल्कि पूरे लोकतंत्र और समाज की दिशा पर सवाल खड़ा करता है। क्या आज का भारत अपने बच्चों को यह सिखा रहा है कि सवाल करना गलत है? क्या सोचने, समझने और जवाब मांगने की आदत अब सत्ता के लिए खतरा बन गई है? और क्या अंधभक्ति, चापलूसी और सरकारी प्रचार दोहराना ही अब राष्ट्रसेवा की नई परिभाषा बन चुका है? यह फर्क साफ बताता है कि व्यवस्था किस तरह के नागरिक चाहती है—सोचने वाले नहीं, बल्कि बिना सवाल किए मानने वाले।
आज हालात ऐसे बनते जा रहे हैं मानो समाज को एक अनकहा संदेश दिया जा रहा हो—जो सवाल करेगा, वह मुश्किल में डाला जाएगा; जो चुप रहेगा, ताली बजाएगा और तयशुदा बातें बोलेगा, उसे सम्मान और पुरस्कार मिलेंगे। यह सोच लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है, क्योंकि लोकतंत्र सवालों से मजबूत होता है, डर और चुप्पी से नहीं। अगर बच्चों को बचपन से ही यह सिखा दिया गया कि सवाल पूछना अपराध है, तो आने वाला भारत जिम्मेदार नागरिकों का नहीं, बल्कि आज्ञाकारी भीड़ का देश बन जाएगा।
यही वह बुनियादी सवाल है, जिस पर आज पूरे समाज को गंभीरता से सोचने की जरूरत है। क्या यही वह “अमृतकाल” है, जिसकी तस्वीर दिखाई जा रही है—जहां सवाल पूछने वालों के लिए FIR और जेल का डर हो, और सरकारी भोंपू बनने वालों के लिए सम्मान, मंच और तमगे? यह फैसला किसी एक सरकार या एक नेता का नहीं है, बल्कि पूरे समाज का है कि वह अपने बच्चों को क्या विरासत देना चाहता है—सोचने और सवाल करने की आज़ादी, या डर, चुप्पी और अंधभक्ति की आदत।




