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EC फिर कटघरे में: BMC चुनाव में गड़बड़ी का आरोप, मतदान में स्याही की जगह मार्कर पर बवाल

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अमरनाथ प्रसाद | 15 जनवरी 2026

मुंबई में चल रहे बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) चुनाव के दौरान चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की उंगली पर लगाई जाने वाली पारंपरिक स्थायी स्याही की जगह मार्कर पेन के इस्तेमाल को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना (UBT) ने इसे लोकतंत्र के लिए खतरनाक करार देते हुए चुनाव आयोग (EC) की तीखी आलोचना की है और आम मतदाताओं से सतर्क रहने की अपील की है। शिवसेना (UBT) का आरोप है कि मार्कर से लगाया गया निशान आसानी से मिटाया जा सकता है। अगर उंगली से निशान हट जाए, तो दोबारा मतदान की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। पार्टी नेताओं का कहना है कि यह सिर्फ तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। उनका सवाल है कि जब देश दशकों से स्थायी और न मिटने वाली स्याही पर भरोसा करता आया है, तो अचानक BMC जैसे बड़े और संवेदनशील चुनाव में नियम क्यों बदले गए।

विपक्ष का सीधा आरोप है कि यह चुनाव आयोग की साधारण लापरवाही नहीं, बल्कि एक गंभीर चूक है। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी होती है कि वह चुनाव को निष्पक्ष, पारदर्शी और भरोसेमंद बनाए रखे। लेकिन मार्कर के इस्तेमाल ने मतदाताओं के मन में संदेह पैदा कर दिया है। विपक्ष का कहना है कि जब आम आदमी को यह भरोसा ही न रहे कि उसका वोट सुरक्षित है और प्रक्रिया निष्पक्ष है, तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर हो जाती है।

उद्धव ठाकरे गुट ने मांग की है कि चुनाव आयोग तुरंत स्थिति स्पष्ट करे और पारंपरिक स्थायी स्याही का ही उपयोग सुनिश्चित करे। पार्टी ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते इस मुद्दे पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो चुनाव नतीजों की निष्पक्षता पर भी सवाल उठ सकते हैं। नेताओं ने मतदाताओं से अपील की है कि मतदान के बाद अपनी उंगली पर लगे निशान पर ध्यान दें और किसी भी तरह की गड़बड़ी दिखने पर तुरंत चुनाव अधिकारियों को सूचना दें।

विवाद ने चुनाव आयोग की भूमिका और निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। एक संवैधानिक संस्था से यह अपेक्षा की जाती है कि वह हर परिस्थिति में चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता और जनता के भरोसे की रक्षा करे। लेकिन BMC चुनाव में स्याही की जगह मार्कर का इस्तेमाल लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने में चूक कर रहा है। लोकतंत्र में भरोसा सबसे बड़ी ताकत होता है—और अगर वही डगमगाए, तो इसके परिणाम दूरगामी और गंभीर हो सकते हैं।

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