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मोदी–शाह का चुनावी हथकंडा: जहां चुनाव, वहां गैर बीजेपी नेताओं पर ED छापे

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आलोक कुमार | नई दिल्ली 13 जनवरी 2026

देश की राजनीति में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की भूमिका को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हाल के वर्षों, खासकर 2021 से 2026 के बीच की घटनाओं को देखें तो एक स्पष्ट पैटर्न उभरता है—जैसे ही किसी राज्य में विधानसभा या लोकसभा चुनाव नजदीक आते हैं, वैसे ही वहां गैर-बीजेपी शासित सरकारों और विपक्षी नेताओं पर ED की फाइलें खुलने लगती हैं, छापे पड़ते हैं और गिरफ्तारियां तेज हो जाती हैं। यही वजह है कि “मोदी–शाह का चुनावी हथकंडा: जहां चुनाव, वहां गैर बीजेपी नेताओं पर ED छापे” जैसी हैडलाइन को केवल राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि घटनाओं की कड़ी से निकला निष्कर्ष माना जा रहा है। ED की सक्रियता अचानक नहीं होती, चुनावी कैलेंडर के साथ कदमताल करती है।

महाराष्ट्र, दिल्ली, झारखंड, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी जैसे राज्यों में ऐसे कई मामले सामने आए, जहां 4–5 साल पुराने केस चुनाव से ठीक पहले “जाग” गए। सवाल यह उठता है कि अगर ये मामले इतने गंभीर थे, तो ED सालों तक खामोश क्यों रही? और जैसे ही वोटिंग की तारीख नजदीक आती है, तभी कार्रवाई की जरूरत क्यों महसूस होती है? यही पैटर्न इस हैडलाइन के मूल भाव को मजबूत करता है।

पश्चिम बंगाल इसका बड़ा उदाहरण है। विधानसभा चुनावों से पहले और अब 2026 के चुनाव नजदीक आते ही, तृणमूल कांग्रेस से जुड़े मामलों में ED की गतिविधियां अचानक तेज हो गईं। कोयला घोटाले जैसे पुराने मामलों में छापे और पूछताछ ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या यह कानून का निष्पक्ष पालन है या चुनावी दबाव बनाने की रणनीति। आर्टिकल साफ तौर पर पूछता है—अगर आरोप इतने संगीन थे, तो ED इतने वर्षों तक क्यों “सोई” रही?

दिल्ली में शराब नीति मामला भी इसी पैटर्न को दोहराता है। 2022 में शुरू हुआ यह केस असल मायनों में 2024–25 के चुनावी दौर में चरम पर पहुंचा, जब उपमुख्यमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक को निशाना बनाया गया। विपक्ष का आरोप है कि इस कार्रवाई का मकसद केवल जांच नहीं, बल्कि चुनी हुई सरकार को अस्थिर करना और गिराना था। यही वजह है कि इसे केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा गया।

झारखंड में तो यह पैटर्न और भी स्पष्ट नजर आया। जैसे ही चुनावी गणित बदला और सत्ता समीकरण संवेदनशील हुए, मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी हो गई, जिससे सरकार गिर गई। आर्टिकल में यह सवाल उठाया गया है कि अगर ED की कार्रवाई पहले होती, तो क्या राजनीतिक नतीजे ऐसे ही होते? यह संयोग कम और चुनावी समय-निर्धारण ज्यादा प्रतीत होता है।

दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों में भी तस्वीर अलग नहीं है। तमिलनाडु में शराब और रियल एस्टेट से जुड़े मामले, केरल में सोना तस्करी, असम और पुडुचेरी में राजनीतिक चेहरों पर जांच—हर जगह एक जैसी कहानी सामने आती है। जहां BJP को चुनावी फायदा दिखता है, वहां विपक्षी दलों पर केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई तेज हो जाती है। इसके उलट, BJP-शासित राज्यों में ऐसे ही आरोपों पर वैसी ही तेजी नजर नहीं आती, जो “सेलेक्टिव टारगेटिंग” के आरोपों को बल देती है।

विपक्ष का साफ आरोप है कि ED का इस्तेमाल डर का माहौल बनाने और राजनीतिक दबाव डालने के लिए किया जा रहा है। सरकार की दलील है कि ED कानून के तहत, स्वतंत्र रूप से काम करती है। लेकिन आर्टिकल यह बुनियादी सवाल उठाता है कि अगर एजेंसी पूरी तरह निष्पक्ष है, तो कार्रवाई का तराजू एक ही तरफ क्यों झुका दिखता है? सत्ता पक्ष के नेताओं पर वैसी ही सख्ती क्यों नहीं दिखाई देती? पूरे विमर्श का व्यापक असर लोकतंत्र की सेहत पर पड़ता है। जब जांच एजेंसियों को “मोदी–शाह की चुनावी मशीन” कहे जाने लगते हैं, तो यह केवल विपक्ष की शिकायत नहीं रह जाती, लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता का सवाल बन जाता है। अगर कानून का इस्तेमाल समान रूप से नहीं होगा, तो जनता का भरोसा कमजोर होगा और चुनावी प्रक्रिया पर भी संदेह गहराएगा।

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