एबीसी नेशनल न्यूज़ | 10 जनवरी 2026
आरोप बेबुनियाद, पक्षपाती और भ्रामक: हरजीत–ज्योति
देश में पर्यावरण और जलवायु संकट पर लगातार सवाल उठाने वाले अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पर्यावरण कार्यकर्ता हरजीत सिंह एक बार फिर जांच एजेंसियों की कार्रवाई के केंद्र में हैं। उत्तर प्रदेश में उनके घर और उनसे जुड़ी संस्थाओं पर पहले प्रवर्तन निदेशालय (ED) और फिर राज्य आबकारी विभाग की ताबड़तोड़ कार्रवाई ने न केवल कई सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह बहस भी तेज कर दी है कि क्या सरकार की नीतियों से असहमति जताने वालों पर अब एजेंसियों का दबाव बढ़ता जा रहा है। यह मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि इसे सरकार की ऊर्जा नीतियों के खिलाफ चल रहे फॉसिल फ्यूल विरोधी पर्यावरण अभियानों से जोड़कर देखा जा रहा है।
हरजीत सिंह लंबे समय से कोयला, तेल और गैस आधारित परियोजनाओं का विरोध करते रहे हैं। वे भारत ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और टिकाऊ विकास को लेकर सरकारों की नीतियों पर सवाल उठाते रहे हैं। ED की कार्रवाई का मुख्य आधार विदेशी फंडिंग है। जांच एजेंसी का आरोप है कि हरजीत सिंह और उनसे जुड़ी संस्था Satat Sampada को विदेशों से बड़ी मात्रा में धन प्राप्त हुआ, जिसका उपयोग भारत में जीवाश्म ईंधन के खिलाफ अभियान चलाने में किया गया। ED का दावा है कि इस फंडिंग को काग़ज़ों में “कंसल्टेंसी” या “अन्य सेवाओं” के नाम पर दिखाया गया, जबकि वास्तव में इसका उद्देश्य सरकार की ऊर्जा नीतियों के खिलाफ जनमत तैयार करना था। एजेंसी इसे देश के “राष्ट्रीय हित” और “ऊर्जा सुरक्षा” से जोड़कर देख रही है। Satat Sampada के संस्थापक हरजीत सिंह और ज्योति अवस्थी का कहना है कि आरोप ‘निराधार, पक्षपातपूर्ण और भ्रामक’ हैं।
मामले में एक और संवेदनशील मोड़ तब आया, जब हरजीत सिंह की पाकिस्तान और बांग्लादेश यात्राओं को भी जांच के दायरे में लिया गया। जांच एजेंसियों का कहना है कि इन यात्राओं का उद्देश्य, खर्च और वहां हुए संपर्कों की गहन पड़ताल की जा रही है। अधिकारियों के अनुसार, यह भी देखा जा रहा है कि कहीं इन यात्राओं का संबंध किसी अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क या संगठित अभियान से तो नहीं है। वहीं, समर्थकों का कहना है कि एक अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण कार्यकर्ता का वैश्विक सम्मेलनों और बैठकों में भाग लेना कोई अपराध नहीं हो सकता।
छापेमारी के दौरान मामला तब और उलझ गया, जब ED को हरजीत सिंह के घर पर कानूनी सीमा से अधिक शराब की बोतलें मिलने की बात सामने आई। इसके बाद ED ने यह जानकारी उत्तर प्रदेश आबकारी विभाग को दी। अगले ही दिन आबकारी विभाग ने अलग से कार्रवाई करते हुए मामला दर्ज किया और हरजीत सिंह को हिरासत में लिया गया, हालांकि बाद में उन्हें बॉन्ड पर रिहा कर दिया गया। आलोचकों का कहना है कि यह कार्रवाई मुख्य जांच से ध्यान भटकाने और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने का एक तरीका भी हो सकती है।
हरजीत सिंह और उनकी पत्नी तथा सह-संस्थापक ज्योति अवस्थी ने सभी आरोपों को पूरी तरह निराधार, पक्षपातपूर्ण और भ्रामक बताया है। उनका कहना है कि वे वर्षों से जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के खिलाफ शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीकों से काम कर रहे हैं। उनके अनुसार, जब भी कोई कार्यकर्ता बड़े कॉरपोरेट हितों या सरकारी नीतियों पर सवाल उठाता है, तो उस पर जांच एजेंसियों के ज़रिये दबाव बनाया जाता है, ताकि उसकी आवाज़ को कमजोर किया जा सके।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब देश में पहले से ही यह बहस तेज है कि क्या जांच एजेंसियों का इस्तेमाल असहमति की आवाज़ों को दबाने के औज़ार के रूप में किया जा रहा है। पर्यावरण कार्यकर्ता, मानवाधिकार संगठन और कई बुद्धिजीवी इस कार्रवाई को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों से जोड़कर देख रहे हैं। वहीं, सरकार और जांच एजेंसियों का कहना है कि कानून सबके लिए समान है और यदि विदेशी फंडिंग या अन्य नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो जांच ज़रूरी है।
कुल मिलाकर, हरजीत सिंह से जुड़ा यह मामला अब केवल एक कानूनी जांच नहीं रह गया है। यह पर्यावरण बनाम विकास, असहमति बनाम राष्ट्रीय हित और लोकतंत्र में सवाल पूछने की आज़ादी जैसे बड़े और संवेदनशील मुद्दों को एक बार फिर देश की सार्वजनिक बहस के केंद्र में ले आया है। अब देखना यह होगा कि जांच का अंतिम निष्कर्ष क्या निकलता है—निष्पक्ष न्याय या असहमति की आवाज़ों पर और कसता शिकंजा।





