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ED रेड के बाद चोरी का आरोप: I-PAC प्रमुख प्रशांत जैन के घर से सामान गायब, जांच एजेंसी पर गहराता संकट

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अरिंदम बनर्जी | कोलकाता 8 जनवरी 2026

प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। देश की जानी-मानी राजनीतिक रणनीति संस्था इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) के प्रमुख प्रशांत जैन के घर हुई ED की छापेमारी के बाद अब उनके परिवार ने पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। परिवार का आरोप है कि रेड के दौरान घर से कुछ कीमती और निजी सामान गायब हो गया, जिसका पता छापेमारी खत्म होने के बाद चला। यह मामला अब सिर्फ एक जांच कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और जवाबदेही पर सीधा सवाल बनकर खड़ा हो गया है।

परिवार की ओर से दर्ज कराई गई शिकायत में कहा गया है कि ED की टीम जब घर में मौजूद थी, उसी दौरान कुछ वस्तुएं अपनी जगह से हटा दी गईं और बाद में वे पूरी तरह गायब पाई गईं। शिकायत के मुताबिक, घर के सदस्यों ने पहले इसे अव्यवस्था या जल्दबाजी का नतीजा समझा, लेकिन जब दोबारा पूरी तरह तलाश की गई तो साफ हो गया कि सामान वास्तव में गायब है। इसके बाद परिवार ने पुलिस का दरवाजा खटखटाया और इस पूरे घटनाक्रम को गंभीर अपराध बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की।

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब प्रवर्तन निदेशालय पहले से ही विपक्षी दलों और नागरिक अधिकार संगठनों के निशाने पर है। लगातार यह आरोप लगते रहे हैं कि ED का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने और असहमति की आवाजों को कमजोर करने के लिए किया जा रहा है। I-PAC का नाम देश की कई बड़ी और प्रभावशाली राजनीतिक रणनीतियों से जुड़ा रहा है, इसलिए प्रशांत जैन के घर हुई रेड को भी कई लोग सिर्फ कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश के रूप में देख रहे हैं।

कानूनी जानकारों का कहना है कि अगर किसी जांच एजेंसी की मौजूदगी में किसी नागरिक के घर से सामान गायब होने का आरोप लगता है, तो यह बेहद गंभीर मामला है। ऐसी स्थिति में केवल एजेंसी के बयान से काम नहीं चल सकता, बल्कि स्वतंत्र और पारदर्शी जांच जरूरी हो जाती है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब आम नागरिकों को जांच एजेंसियों से भय महसूस होने लगे, तो कानून के राज पर लोगों का भरोसा कैसे कायम रहेगा।

इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि क्या भारत में जांच एजेंसियां पर्याप्त निगरानी और जवाबदेही के दायरे में काम कर रही हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी एजेंसी को असीमित शक्ति नहीं दी जा सकती। यदि कोई परिवार खुद को असुरक्षित महसूस करते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराने को मजबूर हो जाए, तो यह संकेत है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं गंभीर खामी मौजूद है।

अब इस मामले में सबकी निगाहें पुलिस जांच पर टिकी हैं। देखना होगा कि पुलिस इस शिकायत को कितनी गंभीरता से लेती है और क्या तथ्यों के आधार पर निष्पक्ष जांच आगे बढ़ती है या नहीं। साथ ही, यह भी अहम होगा कि प्रवर्तन निदेशालय इस आरोप पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देता है। फिलहाल इतना तय है कि यह मामला सिर्फ I-PAC या प्रशांत जैन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा से जुड़ा एक बड़ा सवाल बन चुका है।

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