परवेज खान | भोपाल 7 जनवरी 2026
मध्य प्रदेश से एक बेहद चिंताजनक और दिल को झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आई है। राज्य में 10 साल से कम उम्र के बच्चों में ज़हर पीने के मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। सबसे डराने वाली बात यह है कि इनमें से ज़्यादातर मामले किसी साज़िश या जानबूझकर नहीं, बल्कि खेल-खेल में, अनजाने में हो रहे हैं। बच्चे घर में रखे कीटनाशक, चूहे मारने की दवा, सफाई के केमिकल या रंगीन बोतलों में भरे ज़हरीले तरल को पानी या सॉफ्ट ड्रिंक समझकर पी लेते हैं।
डॉक्टरों के मुताबिक, छोटे बच्चों में समझ और खतरे का एहसास नहीं होता। रंगीन बोतल, मीठी खुशबू या खुला रखा केमिकल उन्हें आकर्षित करता है और एक पल की लापरवाही ज़िंदगी और मौत के बीच का फासला बना देती है। कई मामलों में बच्चे को अस्पताल लाने में थोड़ी भी देर हो जाए, तो हालात गंभीर हो जाते हैं। यही वजह है कि ज़हर पीने के केस अब बच्चों की सेहत से जुड़ी एक बड़ी आपात समस्या बन चुके हैं।
हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एम्स (AIIMS) भोपाल को अलग से कॉल सेंटर बनाना पड़ा। इस कॉल सेंटर पर माता-पिता और परिजन तुरंत फोन कर यह जानकारी लेते हैं कि बच्चे ने क्या निगल लिया है, क्या लक्षण हैं और तुरंत क्या किया जाए। डॉक्टर फोन पर ही शुरुआती सलाह देते हैं, ताकि बच्चे को अस्पताल लाने से पहले स्थिति और न बिगड़े। यह कॉल सेंटर दरअसल इस बात का संकेत है कि समस्या कितनी बड़ी हो चुकी है।
डॉक्टर साफ कहते हैं कि ज़्यादातर हादसे घर के अंदर हो रहे हैं। कीटनाशक बोतलें, फिनाइल, एसिड, टॉयलेट क्लीनर या दवाइयां बच्चों की पहुंच में रखी होती हैं। कई बार इन्हें ठंडे पेय की खाली बोतलों में भरकर रख दिया जाता है, जो बच्चों के लिए और भी ज्यादा खतरनाक साबित होता है। ग्रामीण इलाकों में खेतों में इस्तेमाल होने वाले ज़हरीले रसायन भी बच्चों की जान के दुश्मन बन रहे हैं।
यह खबर सिर्फ आंकड़ों की नहीं, बल्कि माता-पिता और समाज के लिए एक चेतावनी है। बच्चों की सुरक्षा सिर्फ अस्पतालों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि घर से ही शुरू होती है। थोड़ी सी सावधानी—जैसे ज़हरीले पदार्थ बच्चों की पहुंच से दूर रखना, बोतलों पर साफ नाम लिखना और बच्चों पर नजर रखना—कई मासूम जिंदगियों को बचा सकती है। वरना खेल-खेल में हुआ एक पल का हादसा, पूरे परिवार की जिंदगी बदल सकता है।




