Home » National » बनारस में कानून की नींद, एक इंजीनियर की हिम्मत ने खोली चोरी की फैक्ट्री

बनारस में कानून की नींद, एक इंजीनियर की हिम्मत ने खोली चोरी की फैक्ट्री

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

एबीसी न्यूज 7 जनवरी 2026

रोचक लेकिन शर्मनाक सच्चाई

जनवरी 2026 की शुरुआत में बनारस में घटी यह घटना केवल एक मोबाइल चोरी की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था पर करारा तमाचा है जो शिकायत मिलते ही हाथ खड़े कर देती है। मुंबई के घाटकोपर की रहने वाली सॉफ्टवेयर इंजीनियर अंकिता गुप्ता अपने परिवार के साथ काशी दर्शन को आई थीं। अस्सी घाट पर गंगा आरती देखने के बाद जब वे भीड़ से लौट रही थीं, तभी जेबकतरे ने मौका पाकर उनका महंगा आईफोन—जिसकी कीमत करीब 1.5 से 2 लाख रुपये बताई जा रही है—उड़ा लिया। श्रद्धा की नगरी में श्रद्धालु असुरक्षित और चोर बेखौफ—यह तस्वीर खुद में बहुत कुछ कहती है। मोबाइल चोरी होते ही अंकिता सीधे भेलूपुर थाने पहुंचीं। उन्होंने वह सब किया, जो एक जिम्मेदार नागरिक करता है—एफआईआर दर्ज कराई, मोबाइल का बिल, IMEI नंबर और अन्य जरूरी दस्तावेज सौंपे। लेकिन यहां से शुरू होती है पुलिस की उदासीनता की कहानी। शिकायत लेने के बाद भी न तो लोकेशन ट्रेस करने में कोई दिलचस्पी दिखाई गई और न ही सक्रिय छानबीन का कोई संकेत मिला। जवाब वही पुराने—“लोकेशन 100–200 मीटर इधर-उधर हो सकती है”, “भीड़ में चोरी हो गई होगी”—यानि शिकायतकर्ता को ही उलझाकर थकाने की कोशिश।

‘पुलिस कुछ नहीं करेगी’—और इंजीनियर ने कमान संभाली

कुछ ही घंटों में अंकिता को यह साफ हो गया कि अगर वे इंतजार करती रहीं, तो मोबाइल गया समझिए गया। तब उन्होंने अपने तकनीकी ज्ञान और इंजीनियर दोस्तों की मदद ली। संभवतः Find My iPhone/IMEI ट्रैकर जैसे टूल्स का इस्तेमाल कर उन्होंने खुद मोबाइल की लोकेशन ट्रेस की। नतीजा चौंकाने वाला था—लोकेशन बनारस कैंट स्टेशन क्षेत्र में दिखाई दी। यानी तकनीक ने वह काम कर दिखाया, जो कानून की जिम्मेदारी थी।

दरवाज़ा खुला तो निकली चोरी की पूरी खेप

लोकेशन मिलते ही अंकिता खुद उस इलाके में पहुंचीं, मकान मालिक से संपर्क किया और दरवाज़ा खुलवाया। भीतर का दृश्य हैरान करने वाला था—उनका मोबाइल ही नहीं, बल्कि 20 से ज्यादा अन्य चोरी के मोबाइल भी बरामद हुए। यह कोई इक्का-दुक्का वारदात नहीं, बल्कि संगठित चोरी की ओर इशारा था। सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और मोबाइल जब्त किए। सवाल उठता है—जो काम पुलिस घंटों में नहीं कर सकी, वह एक आम नागरिक ने कुछ ही समय में कैसे कर लिया?

खबर फैली तो हरकत में आया सिस्टम, पुलिस पर सवाल और धिक्कार

जैसे ही यह मामला मीडिया और सोशल मीडिया पर आया, पुलिस प्रशासन हरकत में दिखा। बरामद मोबाइलों के आधार पर अन्य पीड़ितों की पहचान की प्रक्रिया शुरू हुई और आरोपी की तलाश की बात कही गई। लेकिन यह सक्रियता शिकायत के समय क्यों नहीं दिखी? क्या पुलिस तब ही जागती है, जब लापरवाही सार्वजनिक हो जाए? यह घटना पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। जब एक पढ़ी-लिखी, तकनीकी रूप से सक्षम महिला को खुद जोखिम उठाकर बरामदगी करनी पड़े, तो आम नागरिक की सुरक्षा का क्या होगा? कानून का डर चोरों में नहीं, शिकायतकर्ताओं में क्यों है? बनारस पुलिस को इस उदासीनता के लिए धिक्कार—क्योंकि सुरक्षा आपकी जिम्मेदारी है, और जिम्मेदारी से भागना अपराध के बराबर है।

बर्खास्तगी की चर्चा, लेकिन पुष्टि नहीं

कुछ रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पोस्ट्स में पुलिस चौकी इंचार्ज की बर्खास्तगी की चर्चा भी सामने आई, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है। अगर कार्रवाई हुई है तो स्वागत योग्य है, और अगर नहीं—तो यह सवाल और बड़ा हो जाता है कि जवाबदेही आखिर तय कब होगी?

तकनीक ने बचाई इज्जत, व्यवस्था बेनकाब

अंकिता गुप्ता की हिम्मत और तकनीकी समझ ने न सिर्फ उनका मोबाइल लौटाया, बल्कि बनारस में चल रही मोबाइल चोरी की एक पूरी फैक्ट्री को उजागर कर दिया। यह घटना बताती है कि जब व्यवस्था सुस्त हो जाए, तो नागरिक को खुद खड़ा होना पड़ता है—लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं। पुलिस को जागना होगा, वरना अगली बार किसी के पास इंजीनियरिंग डिग्री या तकनीकी साधन नहीं होंगे—और तब नुकसान सिर्फ मोबाइल का नहीं, भरोसे का होगा।

5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments