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बच्चों की सेहत पर संकट की आहट: नेस्ले ने कई शिशु उत्पादों की पूरी खेप वापस मंगाई

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अंतरराष्ट्रीय डेस्क 7 जनवरी 2026

जहरीले तत्व होने की आशंका से दुनिया भर में चिंता

यह विषय केवल एक कंपनी, एक देश या एक रिकॉल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर हमारे भविष्य—हमारे बच्चों—की सुरक्षा, स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार से जुड़ा हुआ प्रश्न है। नेस्ले जैसी वैश्विक बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा शिशु उत्पादों की पूरी खेप वापस मंगाया जाना किसी साधारण “तकनीकी चूक” या रूटीन कॉरपोरेट प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह उस भरोसे पर गहरा आघात है, जो माता-पिता वर्षों से ऐसे ब्रांड्स पर आंख मूंदकर करते आए हैं। जब किसी मां-बाप के हाथ में अपने बच्चे को दूध या भोजन देने का डिब्बा होता है, तो वह सिर्फ एक उत्पाद नहीं होता—वह भरोसे, सुरक्षा और भविष्य का वादा होता है। ऐसे में जहरीले या हानिकारक तत्वों की आशंका का सामने आना यह साबित करता है कि कॉरपोरेट व्यवस्था में कहीं न कहीं मुनाफे को मानवता से ऊपर रखने की बीमारी गहराई तक पैठ चुकी है। यह खबर केवल चेतावनी नहीं, बल्कि एक ऐसा आईना है जिसमें पूरी वैश्विक फूड इंडस्ट्री और रेगुलेटरी सिस्टम को खुद को देखना चाहिए।

नेस्ले का कहना है कि आंतरिक गुणवत्ता जांच के दौरान कुछ बैच में ऐसे रासायनिक तत्वों की आशंका सामने आई, जो शिशुओं के लिए सुरक्षित नहीं माने जाते, और इसी कारण एहतियातन पूरी खेप वापस मंगाई जा रही है। सुनने में यह बयान जिम्मेदारी भरा लगता है, लेकिन इसके भीतर कई ऐसे सवाल छिपे हैं, जो इस पूरे मामले को और भयावह बना देते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर यह आशंका जांच में सामने आई, तो यह जांच किस स्तर पर हुई और कब हुई? क्या यह नियमित प्रक्रिया का हिस्सा थी या किसी शिकायत, व्हिसलब्लोअर या बाहरी दबाव के बाद यह जांच की गई? और सबसे अहम प्रश्न यह है कि इस जांच से पहले ये उत्पाद कितने देशों में, कितने घरों में और कितने बच्चों तक पहुंच चुके थे। “अब तक किसी नुकसान की पुष्टि नहीं हुई” जैसे वाक्य बच्चों के मामले में राहत नहीं, बल्कि डर पैदा करते हैं, क्योंकि शिशुओं के शरीर पर किसी जहरीले तत्व का असर तुरंत नहीं, बल्कि वर्षों बाद उनके तंत्रिका तंत्र, हार्मोनल संतुलन और शारीरिक-मानसिक विकास में दिखाई दे सकता है। इसीलिए शिशु आहार के मामले में जोखिम की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए, लेकिन वास्तविकता यह है कि कॉरपोरेट सिस्टम अक्सर ‘कॉस्ट कटिंग’, ‘सप्लाई चेन ऑप्टिमाइजेशन’ और ‘प्रॉफिट मार्जिन’ जैसे शब्दों की आड़ में गुणवत्ता के साथ समझौता करता रहा है।

शिशु आहार और बेबी प्रोडक्ट्स वह क्षेत्र हैं, जहां ‘जीरो रिस्क’ कोई आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि एक अनिवार्य नैतिक शर्त होनी चाहिए। एक वयस्क व्यक्ति गलत भोजन से बीमार हो सकता है, लेकिन एक शिशु का शरीर और मस्तिष्क विकास की सबसे नाज़ुक अवस्था में होता है। किसी भी हानिकारक रसायन का असर केवल पेट या पाचन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह पूरे तंत्रिका तंत्र, हार्मोनल सिस्टम और भविष्य की शारीरिक-मानसिक क्षमताओं को प्रभावित कर सकता है। इसके बावजूद, वैश्विक बाजार में बेबी फूड को उसी प्रोसेस्ड फूड सिस्टम का हिस्सा बना दिया गया है, जहां प्राथमिक लक्ष्य लागत घटाना, उत्पादन बढ़ाना और मुनाफा अधिकतम करना होता है। यही वह बिंदु है जहां कॉरपोरेट नैतिकता की असली परीक्षा होती है, और दुर्भाग्य से यही वह जगह है जहां वह बार-बार असफल होती दिखाई देती है। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे कमजोर कड़ी बनते हैं वे बच्चे, जो न तो विरोध कर सकते हैं, न सवाल पूछ सकते हैं और न ही अपनी पीड़ा शब्दों में व्यक्त कर सकते हैं।

इस पूरे मामले में अगर किसी की भूमिका सबसे अधिक संदेह के घेरे में है, तो वह है रेगुलेटरी सिस्टम। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर FDA जैसी संस्थाएं हों या विभिन्न देशों की स्थानीय फूड सेफ्टी एजेंसियां—सवाल यह है कि जहरीले तत्वों का पता हमेशा तब ही क्यों चलता है, जब उत्पाद लाखों घरों तक पहुंच चुका होता है। क्या बड़ी कंपनियों को ‘सेल्फ-सर्टिफिकेशन’ की इतनी छूट दे दी गई है कि वे अपनी प्रयोगशालाओं में ही अपने उत्पादों को सुरक्षित घोषित कर सकें? यह एक कड़वी सच्चाई है कि अक्सर सरकारी और नियामक एजेंसियां तब जागती हैं, जब कोई व्हिसलब्लोअर सामने आता है या कोई स्वतंत्र शोध रिपोर्ट मीडिया में लीक हो जाती है। नियम कागजों पर भले ही सख्त हों, लेकिन उनका कार्यान्वयन कॉरपोरेट लॉबिंग, विज्ञापन की चमक और राजनीतिक दबाव के नीचे दबकर रह जाता है। शिशुओं के स्वास्थ्य के मामले में सिस्टम को ‘रिएक्टिव’ नहीं, बल्कि ‘प्रिवेंटिव’ होना चाहिए था, लेकिन मौजूदा ढांचा नुकसान होने के बाद मुआवजा गिनने और बयान जारी करने में ही सक्रिय दिखाई देता है।

इस खबर के बाद दुनिया भर के माता-पिता डर, गुस्से और असमंजस में हैं। जिन डिब्बों पर “सेफ फॉर बेबी”, “डॉक्टर्स रिकमेंडेड” और “वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित” जैसे शब्द लिखे होते हैं, वही अब सवालों के घेरे में खड़े हैं। यह सिर्फ उत्पादों की वापसी नहीं है, बल्कि उस भरोसे की वापसी है, जो शायद अब संभव नहीं। माता-पिता यह पूछने को मजबूर हैं कि अगर बच्चों के खाने में जहरीले तत्व निकलते हैं, तो जिम्मेदारी किसकी होगी—कंपनी की, सरकार की या उस पूरे सिस्टम की, जिसने बड़ी कंपनियों को खुली छूट दे रखी है? क्या सिर्फ रिफंड और हेल्पलाइन नंबर देकर नैतिक जिम्मेदारी से मुक्त हुआ जा सकता है? इतिहास गवाह है कि बड़ी कंपनियां अक्सर देर से सच स्वीकार करती हैं, और जब सच सामने आता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

जो लोग यह मानते हैं कि यह पहली बार हुआ है, वे इतिहास को भूल रहे हैं। कॉरपोरेट दुनिया में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जहां बड़ी कंपनियों ने दशकों तक खतरों को दबाए रखा और जब सच सामने आया, तब तक लाखों लोग प्रभावित हो चुके थे। इसका सबसे बड़ा और भयावह उदाहरण जॉन्सन एंड जॉन्सन का बेबी पाउडर मामला है। जिस पाउडर को वर्षों तक “मां का भरोसा” और “बेबी सॉफ्ट स्किन” का प्रतीक बताया गया, उस पर आरोप लगे कि उसमें इस्तेमाल किए गए टैल्क में एस्बेस्टस जैसे कैंसरकारी तत्व मौजूद थे। हजारों महिलाओं ने अदालत में दावा किया कि लंबे समय तक इस पाउडर के इस्तेमाल से उन्हें ओवेरियन कैंसर हुआ। अमेरिकी अदालतों में चले मुकदमों के दौरान दस्तावेजों और गवाहियों से यह सामने आया कि कंपनी को संभावित जोखिमों की जानकारी वर्षों पहले थी, लेकिन इसके बावजूद उत्पाद बाजार में बेचा जाता रहा। नतीजा यह हुआ कि कंपनी पर अरबों डॉलर के जुर्माने लगे, वैश्विक स्तर पर उसकी छवि को गहरा नुकसान पहुंचा और अंततः कई देशों में टैल्क-आधारित बेबी पाउडर की बिक्री बंद करनी पड़ी। यह फैसला किसी नैतिक जागृति का नहीं, बल्कि कानूनी दबाव और सार्वजनिक आक्रोश का परिणाम था।

जॉन्सन एंड जॉन्सन का मामला एक चेतावनी था कि बच्चों और महिलाओं से जुड़े उत्पादों में थोड़ी-सी भी लापरवाही कानूनी, नैतिक और मानवीय अपराध बन सकती है। लेकिन नेस्ले का मौजूदा संकट यह दिखाता है कि फूड और बेबी प्रोडक्ट इंडस्ट्री ने शायद इससे कोई ठोस सबक नहीं लिया। जब तक अदालतें मजबूर न करें और जब तक जनदबाव न बने, तब तक कॉरपोरेट सिस्टम आत्ममंथन को तैयार नहीं दिखता, और तब तक नुकसान हो चुका होता है।

नेस्ले का यह रिकॉल केवल एक कंपनी का आंतरिक मामला नहीं है। यह एक चेतावनी है—उपभोक्ताओं के लिए, सरकारों के लिए, रेगुलेटरी एजेंसियों के लिए और पूरी वैश्विक फूड इंडस्ट्री के लिए। बच्चों की जिंदगी किसी ब्रांड वैल्यू, मार्केट शेयर या शेयरहोल्डर मीटिंग से कहीं ज्यादा कीमती है। आज असली सवाल यह नहीं है कि नेस्ले ने रिकॉल क्यों किया, बल्कि यह है कि क्या अगली बार भी हमें जॉन्सन एंड जॉन्सन की तरह किसी अदालत के फैसले का इंतजार करना पड़ेगा? अगर जवाब “हां” है, तो यह मानवता की सामूहिक हार होगी। और अगर जवाब “नहीं” होना है, तो सिस्टम को अभी, इसी वक्त, बच्चों को केंद्र में रखकर बदलना होगा—क्योंकि इतिहास ने साफ दिखा दिया है कि जब कॉरपोरेट लालच और मासूम जानें आमने-सामने होती हैं, तो चुप्पी भी एक अपराध बन जाती है।

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