एबीसी डेस्क 6 जनवरी 2026
कहां और कैसे हुए धमाके
मणिपुर में कुछ दिनों की शांति के बाद हालात फिर से विस्फोटों की आवाज़ में बदल गए। राज्य में तीन घंटे के भीतर दो IED ब्लास्ट हुए, जिसने साफ कर दिया कि ज़मीन पर हालात अब भी बेहद नाज़ुक हैं। इन धमाकों से पूरे इलाके में दहशत फैल गई और आम लोग फिर डर के साए में जीने को मजबूर हो गए। जिन घरों में लोग सुकून की सांस लेना चाहते थे, वहीं बारूद की गंध फैल गई। यह घटना बताती है कि मणिपुर में शांति अभी भी सिर्फ काग़ज़ों तक सीमित है। पहला धमाका बिष्णुपुर जिले के फोगाकचाओ थाना क्षेत्र के एक गांव में हुआ, जहां एक घर को निशाना बनाया गया। इसके कुछ ही घंटों बाद दूसरा धमाका हुआ, जब आसपास लोग मौजूद थे। इन हमलों में एक महिला और एक पुरुष घायल हुए हैं, जिन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया। विस्फोट की तीव्रता इतनी ज्यादा थी कि एक घर पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया। पुलिस का कहना है कि दोनों धमाके IED से किए गए, जिससे यह आशंका और गहरी हो गई है कि हिंसा योजनाबद्ध तरीके से फैलाई जा रही है।
24 घंटे का बंद, मणिपुर ठहर सा गया
धमाकों के बाद सुरक्षा कारणों से पूरे इलाके में 24 घंटे का बंद लागू करना पड़ा। बाज़ार बंद रहे, सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा और आम लोगों की आवाजाही थम गई। प्रशासन ने अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की, लेकिन डर का माहौल बना रहा। लोग अपने घरों में दुबके रहे और मोबाइल फोन पर सिर्फ एक-दूसरे से यही पूछते रहे—अब आगे क्या होगा? बंद ने यह साफ कर दिया कि हालात कितने गंभीर हैं।
छह महीने से कोशिश, लेकिन शांति अब भी दूर
सरकार, गृह मंत्रालय, राज्यपाल और सुरक्षा बल पिछले छह महीनों से शांति बहाली के प्रयास करने का दावा कर रहे हैं। लगातार बैठकें, बयान और योजनाएं सामने आईं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई अलग है। न तो हिंसा पूरी तरह रुकी है और न ही कोई ठोस राजनीतिक समाधान सामने आया है। IED ब्लास्ट यह संकेत देते हैं कि उग्रवादी अब भी सक्रिय हैं और राज्य में स्थायी शांति की राह बहुत लंबी है।
सुरक्षा व्यवस्था पर जनता का गुस्सा
धमाकों के बाद स्थानीय लोगों में गुस्सा साफ दिखा। लोगों का आरोप है कि सुरक्षा बल मौके पर देर से पहुंचे और सुरक्षा के दावे सिर्फ काग़ज़ों तक सीमित हैं। नाराज़ लोगों ने एक अस्थायी सुरक्षा बंकर को भी नुकसान पहुंचाया। जनता का सवाल सीधा है—अगर सुरक्षा मजबूत है, तो धमाके कैसे हो रहे हैं? इस गुस्से के पीछे डर, थकान और टूटा हुआ भरोसा साफ झलकता है।
आंकड़े नहीं, उजड़ी हुई ज़िंदगियां
पिछले डेढ़ साल से जारी हिंसा में 260 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और 60 हजार से अधिक लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं। ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि वे परिवार हैं जिनकी दुनिया उजड़ चुकी है। बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे, महिलाएं असुरक्षित महसूस कर रही हैं और बुज़ुर्ग अपने ही घरों में शरणार्थी बन गए हैं। मणिपुर का दर्द हर दिन गहराता जा रहा है।
राजनीतिक समाधान की तलाश
सरकार की ओर से कुकी और मैतेई समुदायों के बीच बातचीत की बात कही जा रही है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर भरोसे की कमी साफ नजर आती है। राजनीतिक दलों के भीतर से भी आवाज़ उठ रही है कि बिना स्थिर और पूर्ण सरकार के शांति संभव नहीं है। एक विधायक ने साफ कहा कि जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखेगी, तब तक हालात नहीं बदलेंगे। लोग अब सिर्फ बयान नहीं, ठोस समाधान चाहते हैं।
सबसे बड़ा सवाल: मणिपुर कब शांत होगा?
हर धमाके के बाद मणिपुर वही सवाल दोहराता है—कब खत्म होगी यह हिंसा? क्या मणिपुर सिर्फ सुरक्षा बलों के भरोसे छोड़ा गया है, या सरकार के पास कोई ठोस रोडमैप है? जब तक न्याय, भरोसा और राजनीतिक समाधान ज़मीन पर नहीं उतरते, तब तक शांति सिर्फ एक शब्द बनी रहेगी। मणिपुर आज भी जवाब मांग रहा है—और यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता।




