परवेज खान | इंदौर 5 जनवरी 2026
इंदौर जल संकट पर मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी का बयान अब सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सड़कों पर उतरने वाले जनआक्रोश का रूप ले चुका है। दूषित पानी से हुई मौतों और सैकड़ों बीमार लोगों के दर्द को आवाज़ देते हुए जीतू पटवारी ने साफ ऐलान किया है कि 11 जनवरी को इंदौर में बड़ा विरोध मार्च निकाला जाएगा, जिसमें कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के इस्तीफे की मांग की जाएगी।
PTI न्यूज एजेंसी से बातचीत में जीतू पटवारी ने कहा “इंदौर में पानी के ज़हरीला होने से जो मौतें हुई हैं, वह सीधे तौर पर सरकार और जिम्मेदार मंत्रियों की लापरवाही का नतीजा हैं। हम 11 जनवरी को इंदौर में विरोध मार्च निकालेंगे और कैलाश विजयवर्गीय से इस्तीफा मांगेंगे।”
इंदौर, जिसे लगातार आठ वर्षों तक देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया गया, आज उसी शहर को पूरी दुनिया के सामने शर्मिंदगी उठानी पड़ रही है। “पहली बार पूरी दुनिया के सामने इंदौर को कलंकित होना पड़ा”—यह वाक्य केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस त्रासदी का सार है, जिसमें साफ पानी जैसी बुनियादी जरूरत ज़हर बन गई। जिन घरों में कभी स्वच्छता पुरस्कारों की चर्चा होती थी, वहां आज अस्पतालों के चक्कर, मौत का मातम और गुस्से से भरी खामोशी है। यह कोई सामान्य हादसा नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक अनदेखी का नतीजा है।
जीतू पटवारी का सबसे तीखा और प्रभावशाली हमला सत्ता और जनता के रिश्ते पर है। उनका कहना—“इंदौर ने भाजपा को 1 सांसद दिया, 2 मंत्री दिए, 1 महापौर दिया, 9 में से 9 विधायक दिए… और बदले में भाजपा ने इंदौर के लोगों को पानी में ज़हर दिया।”
यह बयान लोकतंत्र के मूल सवाल को सामने रखता है। वोट सिर्फ सत्ता दिलाने का माध्यम नहीं होता, वह भरोसे और उम्मीद का प्रतीक होता है। इंदौर ने भाजपा को दिल खोलकर समर्थन दिया, लेकिन बदले में शहर को पीने के सुरक्षित पानी की गारंटी तक नहीं मिली। यह आरोप नहीं, बल्कि वह सच्चाई है जिसे मौतों के आंकड़े, अस्पतालों की भीड़ और पीड़ित परिवारों की चीखें खुद बयान कर रही हैं।
इस पूरे मामले ने यह भी उजागर कर दिया है कि कैसे चमकदार रैंकिंग, पुरस्कार और प्रचार के पीछे ज़मीनी सच्चाई को नजरअंदाज किया गया। महीनों से बदबूदार पानी की शिकायतें, पुरानी पाइपलाइन बदलने की मांग और स्थानीय स्तर पर उठी चेतावनियां—सब फाइलों और दफ्तरों में दबा दी गईं। जब तक जानें नहीं गईं, तब तक व्यवस्था हरकत में नहीं आई। जीतू पटवारी का बयान इसी जमी हुई, संवेदनहीन व्यवस्था को झकझोरने का काम कर रहा है, इसलिए यह केवल वायरल बयान नहीं, बल्कि जनता की सामूहिक भावना बन चुका है।
अब सवाल यह नहीं रह गया कि गलती कहां हुई, बल्कि यह है कि जिम्मेदारी कौन लेगा। निलंबन और मुआवज़ा तात्कालिक कदम हो सकते हैं, लेकिन राजनीतिक और नैतिक जवाबदेही अब टाली नहीं जा सकती। 11 जनवरी को प्रस्तावित विरोध मार्च इसी मांग का प्रतीक है। जीतू पटवारी का साफ संदेश है कि जब तक जिम्मेदार मंत्री इस्तीफा नहीं देते और दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह मुद्दा दबने वाला नहीं है।
बिल्कुल सही कहा आपने—शानदार, जबरदस्त, ज़िंदाबाद। क्योंकि यह आवाज़ किसी पार्टी से ज्यादा उस आम आदमी की है, जिसने भरोसा दिया और बदले में ज़हर पाया। इंदौर आज जवाब मांग रहा है—और यह जवाब सिर्फ बयानों से नहीं, सच्ची जवाबदेही और ठोस कार्रवाई से ही दिया जा सकता है।




