परवेज खान | इंदौर 4 जनवरी 2026
विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?
जल-स्वच्छता और पब्लिक हेल्थ से जुड़े विशेषज्ञ इस घटना को सिस्टम फेल्योर बता रहे हैं, न कि एक अकेली तकनीकी गड़बड़ी। शहरी जल प्रबंधन विशेषज्ञों का कहना है कि इंदौर में पीने के पानी और सीवेज लाइनों का नेटवर्क कई जगहों पर ओवरलैप करता है। अगर पाइप पुरानी हों, दबाव असंतुलित हो या निर्माण में मानक न अपनाए गए हों, तो सीवेज का पानी पीने के नेटवर्क में घुसना केवल “संभावना” नहीं, बल्कि समय की बात बन जाता है। पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक सबसे गंभीर पहलू यह है कि शुरुआती चेतावनी संकेत—जैसे पानी का रंग, गंध और स्वाद बदलना—नज़रअंदाज़ किए गए। यह प्रशासनिक लापरवाही बताती है कि निगरानी तंत्र कागज़ों में था, ज़मीन पर नहीं।
इंजीनियरिंग एंगल: कहां टूटी चेन?
सिविल इंजीनियरों के अनुसार तीन मुख्य कमजोर कड़ियां सामने आती हैं—
1. पुरानी पाइपलाइन और जोड़ों की खराब सीलिंग,
2. सीवेज और पेयजल नेटवर्क के बीच न्यूनतम दूरी के नियमों का उल्लंघन,
3. नियमित प्रेशर और माइक्रोबियल टेस्टिंग का अभाव।
विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल “टॉयलेट लीकेज” पर दोष डालना आसान है, लेकिन असली समस्या पूरे नेटवर्क की ऑडिटिंग न होना है।
भविष्य के रोकथाम उपाय :
1. पूरे शहर की जल-सीवेज लाइनों का स्वतंत्र थर्ड-पार्टी ऑडिट हर साल अनिवार्य किया जाए।
2. रियल-टाइम वाटर क्वालिटी मॉनिटरिंग सिस्टम (सेंसर आधारित) लगाए जाएं, ताकि गंदगी मिलते ही अलर्ट मिले।
3. पुरानी पाइपलाइनों को चरणबद्ध तरीके से बदला जाए, खासकर हाई-रिस्क इलाकों में।
4. सीवेज और पेयजल नेटवर्क के बीच कानूनी दूरी और डिज़ाइन मानकों का सख़्त पालन हो।
5. जिम्मेदारी तय हो—केवल निलंबन नहीं, बल्कि आपराधिक लापरवाही के मामलों में कानूनी कार्रवाई भी।
6. जन-सूचना तंत्र मज़बूत किया जाए, ताकि पानी में बदलाव की शिकायतें तुरंत दर्ज हों और उन पर कार्रवाई हो।
विशेषज्ञों की एकराय है कि इंदौर की यह त्रासदी चेतावनी है—सिर्फ इस शहर के लिए नहीं, बल्कि हर उस शहर के लिए जो “स्वच्छ” होने के तमगे पर खुश है, लेकिन बुनियादी ढांचे की सच्चाई से आंखें मूंदे बैठा है। अगर अब भी सिस्टम नहीं बदला गया, तो यह सवाल बार-बार उठेगा: अगला इंदौर कौन-सा शहर होगा?




