महेंद्र कुमार | नई दिल्ली 3 जनवरी 2026
दिसंबर 2012 में दिल्ली की एक चलती बस में हुई जघन्य दरिंदगी ने पूरे भारत को भीतर तक हिला दिया था। एक युवती के साथ घंटों की अमानवीय हिंसा और फिर उसकी मौत ने देश को सड़कों पर ला खड़ा किया था। हर शहर में प्रदर्शन, हर हाथ में मोमबत्ती और हर ज़ुबान पर इंसाफ़ की मांग थी। संसद से लेकर चाय की दुकानों तक यही चर्चा थी कि अब बहुत हो चुका है, अब व्यवस्था बदलेगी, अब बेटियां सुरक्षित होंगी। उस दौर में ऐसा लगा था कि भारत का ज़मीर जाग चुका है और सत्ता से लेकर सिस्टम तक सबको जवाब देना पड़ेगा। लेकिन 13 साल बाद पीछे मुड़कर देखें तो सवाल उठता है—क्या वह जागरण सच था या सिर्फ़ एक भावनात्मक उफान?
वही दरिंदगी, वही सड़कें—लेकिन इस बार सन्नाटा
28 दिसंबर 2025 को NCR में एक 28 वर्षीय महिला को दो घंटे से अधिक समय तक एक चलती वैन में सामूहिक बलात्कार का शिकार बनाया गया और फिर उसे सड़क पर फेंक दिया गया। ज़ख्म वही थे, दर्द वही था, बर्बरता का स्तर भी वही था। फर्क सिर्फ़ इतना था कि इस बार देश लगभग खामोश रहा। न सड़कों पर गुस्सा दिखा, न सत्ता से तीखे सवाल हुए, न “निर्भया” जैसे किसी शब्द ने राष्ट्रीय चेतना को झकझोरा। अपराध वही रहा, लेकिन समाज का चेहरा बदल चुका था—अब आक्रोश की जगह उदासीनता ने ले ली थी।
गुस्से से सुन्नपन तक: एक खतरनाक सामाजिक पतन
2012 में हम सड़कों पर थे, 2025 में हम स्क्रीन पर हैं। आज भारत में हर दिन सौ से ज़्यादा महिलाएं यौन हिंसा का शिकार होती हैं, लेकिन ये घटनाएं अब राष्ट्रीय आपातकाल नहीं रहीं। ये महज़ आंकड़े बन गई हैं, जिन्हें हम पढ़ते हैं, शेयर करते हैं और फिर भूल जाते हैं। यह अज्ञानता नहीं है, यह संवेदनाओं की थकान है—एक ऐसा सुन्नपन, जो समाज को भीतर से खोखला कर रहा है। जब हिंसा रोज़मर्रा की खबर बन जाए, तो ज़मीर धीरे-धीरे मरने लगता है।
क्या लॉ एंड ऑर्डर सिर्फ कांग्रेस की जिम्मेदारी थी?
एक ज़रूरी और असहज सवाल यहां खड़ा होता है—क्या कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक सख्ती, सिस्टम को दुरुस्त करने और बेहतर व कुशल नेतृत्व देने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ कांग्रेस सरकारों की थी? 2012 में सत्ता में कांग्रेस थी, इसलिए गुस्सा था, आंदोलन थे, अनशन थे, और नैतिकता की दुहाई दी जा रही थी। लेकिन आज, जब देश के बड़े हिस्से में बीजेपी की सरकार है, तब क्या अपराध रुक गए हैं? क्या महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा खत्म हो गई है? अगर नहीं, तो फिर सवाल क्यों नहीं उठते? क्या सत्ता बदलते ही जवाबदेही के मापदंड भी बदल जाते हैं?
भक्ति का दौर और सवाल पूछने पर पाबंदी
आज का सच यह है कि चाहे कितनी भी बड़ी गड़बड़ी क्यों न हो जाए, सत्ता के भक्तों के लिए आवाज़ उठाना मानो हराम हो गया है। आलोचना को देशद्रोह और सवाल को साज़िश बताने की आदत बन चुकी है। जब सत्ता को चुनौती देना गुनाह बन जाए, तब अपराधियों का हौसला बढ़ता है और पीड़ित अकेली पड़ जाती है। यह स्थिति किसी एक पार्टी से ज़्यादा खतरनाक है—यह लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है।
अन्ना हजारे: अनशन से गहरी निंद्रा तक
याद कीजिए अन्ना हजारे को। कांग्रेस सरकार के दौर में भ्रष्टाचार के नाम पर अनशन, आंदोलन और सत्ता गिराने तक का माहौल बनाया गया। देश को बताया गया कि नैतिकता खतरे में है, इसलिए सड़क पर उतरना ज़रूरी है। लेकिन जब से बीजेपी की सरकार आई है, अन्ना हजारे मानो गहरी निंद्रा में चले गए हैं। क्या भ्रष्टाचार खत्म हो गया? क्या सिस्टम पूरी तरह शुद्ध हो गया? या फिर नैतिकता भी सत्ता के रंग में रंग गई? यह चयनात्मक सक्रियता समाज को यह संदेश देती है कि विरोध भी सत्ता देखकर किया जाता है।
आंकड़ों के पीछे दबती इंसानी चीखें
हर बलात्कार की खबर के पीछे एक महिला की टूटती दुनिया होती है, एक परिवार का बिखरता भरोसा होता है। लेकिन जब राजनीति, भक्ति और चुप्पी मिलकर माहौल बना दें, तो ये चीखें आंकड़ों में दब जाती हैं। मीडिया भी अक्सर सत्ता की असहजता से बचता दिखता है, और सोशल मीडिया शोर के बावजूद वास्तविक दबाव पैदा नहीं हो पाता। नतीजा यह होता है कि पीड़िता सिर्फ़ अपराधियों से नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम से लड़ रही होती है।
ज़मीर की वापसी ही असली समाधान
कानून, पुलिस, अदालत—ये सब ज़रूरी हैं, लेकिन काफी नहीं। जब तक समाज सत्ता से सवाल पूछना नहीं सीखेगा, जब तक अपराध को पार्टी के चश्मे से देखना बंद नहीं करेगा, तब तक कोई भी महिला सुरक्षित नहीं हो सकती। हर महिला एक सुरक्षित देश की हक़दार है, और हर वह समाज जो भक्ति के नाम पर चुप हो जाता है, उसे कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। क्योंकि जिस दिन हमने सवाल पूछना पूरी तरह छोड़ दिया, उस दिन यह मान लेना चाहिए कि समस्या सिर्फ़ अपराध की नहीं, हमारे ज़मीर की भी है।




