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चोर मचाए शोर!

जब सवाल वोट चोरी पर उठे, तो जवाब में क्लीन चिट का सर्वे पेश कर दिया गया। चुनाव आयोग और नरेंद्र मोदी के नाम से एक ऐसा सर्वे सामने आया, जिसमें बताया गया कि जनता को EVM पर पूरा भरोसा है और भारत में चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष होते हैं। सुनने में सब ठीक लगता है—लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है।

रोचक (और गंभीर) बात यह है कि यह सर्वे जिस NGO GRAAM ने कराया, उसका संबंध नरेंद्र मोदी के करीबी आर. बालासुब्रमणयम से बताया जा रहा है। यही नहीं, आलोचकों का कहना है कि बालासुब्रमणयम ने मोदी की प्रशंसा में किताब भी लिखी है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या यह स्वतंत्र सर्वे है या सत्ता के करीबियों से दिलवाई गई ‘क्लीन चिट’?

आरोप लगाने वालों का तर्क साफ है: जब वोट चोरी के सवाल तेज़ हुए, तब जनता का ध्यान भटकाने के लिए भरोसेमंद दिखने वाले, लेकिन पक्षपाती सर्वे सामने लाए गए। यही वजह है कि इस सर्वे की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कौन पूछ रहा है, कैसे पूछ रहा है, किससे पूछ रहा है—और किस मकसद से? इन सवालों के बिना कोई सर्वे सच का प्रमाण नहीं बन सकता।

आलोचकों का कहना है कि अगर सब कुछ इतना ही साफ है, तो फिर स्वतंत्र, पारदर्शी और निष्पक्ष जांच से डर क्यों? अपने ही करीबी संस्थानों से कराए गए सर्वे भरोसा नहीं बढ़ाते, बल्कि घबराहट उजागर करते हैं। देश की जनता अब सवाल पूछ रही है—और सवालों के जवाब PR सर्वे नहीं, पारदर्शिता देती है।

नरेंद्र मोदी जी, ऐसे सर्वे सच्चाई नहीं बदलते। उल्टा, यह संदेश देते हैं कि सत्ता सवालों से असहज है। जनता अब ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर ठोस जवाब चाहती है—क्लीन चिट नहीं, क्लैरिटी।

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