परवेज खान | इंदौर 2 जनवरी 2026
सवालों के घेरे में मोहन यादव और कैलाश विजयवर्गीय
इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी से फैली बीमारी अब महज़ एक प्रशासनिक चूक नहीं रही, बल्कि यह सरकारी लापरवाही, सिस्टम की विफलता और सत्ता की संवेदनहीनता का भयावह उदाहरण बन चुकी है। बैक्टीरिया मिला पानी, सीवेज से जुड़ी पाइपलाइन, महीनों से रुका अधूरा काम और मौतों के विरोधाभासी आंकड़े—इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी है? और क्यों सरकार तथा उसके प्रभावशाली नेता साफ जवाब देने के बजाय बचाव और लीपापोती में जुटे हैं? बीजेपी की वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने भी इस मुद्दे पर अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सिस्टम काम नहीं कर रहा था, तो जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग जनता के बीच क्यों नहीं पहुंचे? उमा भारती का यह बयान साफ करता है कि मामला इतना गंभीर है कि सत्ता के भीतर से भी असंतोष की आवाज़ उठने लगी है।
MGM मेडिकल कॉलेज की लैब रिपोर्ट ने साफ-साफ बता दिया है कि 26 पानी के सैंपलों में बैक्टीरियल कंटामिनेशन पाया गया और सीवेज का पानी पीने की सप्लाई में मिला। इसके बावजूद सरकार मौतों के आंकड़े स्वीकार करने से बचती नजर आ रही है। इस पूरे मामले में मध्य प्रदेश सरकार और वरिष्ठ बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। इंदौर, जिसे “देश का सबसे साफ शहर” कहकर मंचों से प्रचारित किया जाता रहा, उसी शहर में पीने के पानी की पाइपलाइन के नीचे टॉयलेट बना होना और चार महीने से नई सप्लाई लाइन का काम रुका रहना किसकी जिम्मेदारी है? अगर प्रशासन सतर्क था, तो हजारों लोगों के बीमार पड़ने और दर्जनों जानें जाने से पहले कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जब लोग अपने बच्चों, बुज़ुर्गों और परिजनों को खो रहे थे, तब सत्ता में बैठे लोग इसे “राजनीतिक बयानबाज़ी” बताकर किनारा करते रहे। कैलाश विजयवर्गीय जैसे नेता, जिनकी शहर और संगठन पर मजबूत पकड़ मानी जाती है, उनसे अब तक न कोई नैतिक जिम्मेदारी ली गई, न इस्तीफे की बात हुई और न ही खुली माफी। सिर्फ सफाइयाँ और बयान—क्या यही जवाबदेह शासन की पहचान है?
यह सवाल भी लगातार गूंज रहा है कि अगर ऐसा हादसा किसी गैर-बीजेपी शासित राज्य में हुआ होता, तो क्या सत्ताधारी दल का रवैया यही होता? तब शायद सड़कों पर प्रदर्शन होते, केंद्रीय एजेंसियों से जांच की मांग होती और नैतिकता के लंबे भाषण दिए जाते। लेकिन यहां मामला अपनी सरकार का है, इसलिए मौतें भी सिर्फ आंकड़ों में बदल दी गईं।
इंदौर दूषित पानी कांड ने एक बार फिर यह कड़वा सच उजागर कर दिया है कि गरीब और आम आदमी की ज़िंदगी सिस्टम के लिए अब भी सबसे सस्ती है। अब वक्त है कि सरकार लीपापोती छोड़कर स्वतंत्र और पारदर्शी जांच, जिम्मेदार अधिकारियों व राजनीतिक संरक्षण देने वालों पर सख्त कार्रवाई, और पीड़ित परिवारों को सम्मानजनक मुआवज़ा दे। वरना इतिहास यही लिखेगा कि इंदौर में लोग पानी नहीं, सत्ता की लापरवाही पीकर मरे।




