Home » National » WATCH VIDEO: तलवारें, नफरत और जहरीले बोल : गाजियाबाद में हथियार बांटते संगठन, अल्पसंख्यक दहशत में

WATCH VIDEO: तलवारें, नफरत और जहरीले बोल : गाजियाबाद में हथियार बांटते संगठन, अल्पसंख्यक दहशत में

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

अवधेश कुमार | गाजियाबाद | 30 दिसंबर 2025

खुलेआम धमकियां, सड़कों पर हथियार और डरा हुआ आदमी

देश की राजधानी से सटे गाजियाबाद में जो तस्वीरें सामने आई हैं, वे किसी अफ़वाह का नतीजा नहीं, बल्कि एक डरावनी हकीकत का आईना हैं। खुलेआम तलवारें और कुल्हाड़ियां बांटते लोग, वीडियो में मुस्कराते चेहरे और पीछे छिपी नफरत—यह सब उस वक्त हो रहा है जब अल्पसंख्यक समुदाय पहले से ही असुरक्षा और डर के साए में जी रहा है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और बयानों में मुसलमानों और ईसाइयों को खुले तौर पर धमकियां दी गईं। सवाल यह नहीं कि यह सब कैसे हुआ, सवाल यह है कि इतना सब खुलेआम होने के बाद भी सिस्टम की आंखें इतनी देर तक क्यों बंद रहीं?

हिंदुओं को ISIS जैसा संगठन बनाना चाहिए”—नफरत का खुला ऐलान

एक वायरल बयान में “बजरंग दल–फजरंग दल छोड़कर ISIS जैसा संगठन बनाने” जैसी बात कही जाती है। यह महज़ भड़काऊ भाषण नहीं, बल्कि हिंसा की सीधी वकालत है। ऐसी भाषा समाज को बांटती नहीं, उसे जलाने का काम करती है। जब किसी समुदाय को “आत्मघाती दस्ते” बनाने की बात कही जाती है, तो यह कानून-व्यवस्था के लिए खतरा ही नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा पर सीधा हमला है। यह बयान बताता है कि नफरत अब फुसफुसाहट नहीं रही—वह माइक पर चढ़ चुकी है।

हथियारों की ‘रक्षा’ या डर का कारोबार?

गाजियाबाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए तलवार वितरण के मामले में 10 लोगों को गिरफ्तार किया, हथियार ज़ब्त किए और दंगा, गैरकानूनी जमावड़ा व वैमनस्य फैलाने की धाराओं में केस दर्ज किया। आरोपियों ने इसे “हिंदुओं की सुरक्षा” का नाम दिया। लेकिन असली सवाल यह है—क्या सुरक्षा हथियार बांटकर आती है, या भरोसे और कानून से? जब हथियार सड़कों पर उतरते हैं, तो सुरक्षा नहीं, डर पैदा होता है—खासकर उन इलाकों में जहां अल्पसंख्यक पहले से निशाने पर हैं।

सोशल मीडिया से सड़क तक—नफरत की तेज़ रफ्तार

यह मामला बताता है कि नफरत की राजनीति अब पोस्ट से जुलूस तक का सफर बहुत तेजी से तय कर रही है। वीडियो, भाषण और हथियार—तीनों एक साथ दिखते हैं। पुलिस की कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन सवाल बना रहता है: क्या कार्रवाई तब होगी जब वीडियो वायरल हो जाए, या पहले भी हो सकती है? कानून का काम सिर्फ आग बुझाना नहीं, आग लगने से पहले उसे रोकना भी है।

मीडिया की खामोशी और जनता की बेचैनी

इस पूरे घटनाक्रम पर मुख्यधारा के कई चैनलों की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। जब धमकियां खुलेआम दी जाती हैं, हथियार बांटे जाते हैं और समुदाय विशेष को निशाना बनाया जाता है—तो यह ‘छोटी खबर’ कैसे बन जाती है? खामोशी अक्सर अपराधियों को हौसला देती है और पीड़ितों को अकेला छोड़ देती है।

लोकतंत्र की कसौटी: बराबरी और सुरक्षा

यह मामला किसी एक संगठन या शहर तक सीमित नहीं है। यह उस लोकतंत्र की परीक्षा है, जो बराबरी, कानून और इंसानियत पर खड़ा है। सवाल सीधा है—क्या नफरत फैलाने वालों पर वही सख्ती दिखेगी जो आम नागरिक पर दिखती है? क्या हर आदमी, हर समुदाय, बिना डर के जी पाएगा?

जवाबदेही अब टाली नहीं जा सकती

आज जरूरत है सख्त, निष्पक्ष और लगातार कार्रवाई की—सिर्फ गिरफ्तारियों की नहीं, बल्कि नफरत की जड़ों पर वार की। हथियारों की राजनीति को “रक्षा” का नाम देकर वैध ठहराने की कोशिशों को वहीं रोकना होगा। क्योंकि अगर आज तलवारें बांटी जा रही हैं, तो कल भरोसा टूटेगा—और टूटे भरोसे की कीमत पूरा समाज चुकाता है। देश को आज एक साफ संदेश चाहिए कि कानून सबके लिए बराबर है, नफरत के लिए यहां कोई जगह नहीं।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments