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WATCH VIDEO — देर से जागी सत्ता, पहले टूट गया भरोसा: एंजेल चकमा की मौत पर धामी सरकार की संवेदनहीनता पर सवाल

शैलेन्द्र नेगी | देहरादून 29 दिसंबर 2025

देहरादून में त्रिपुरा की छात्रा एंजेल चकमा पर हुए हमले और फिर उसकी मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया, लेकिन उत्तराखंड की सत्ता को जैसे इस दर्द की आहट सुनाई ही नहीं दी। 9 दिसंबर को हमला हुआ, 26 दिसंबर को एंजेल ने दम तोड़ा, स्थानीय मीडिया और सोशल मीडिया पर उसी दिन खबर फैल गई। 27 दिसंबर को राष्ट्रीय मीडिया ने भी इस मामले को प्रमुखता से उठाया। इसके बावजूद सरकार की ओर से कोई ठोस, संवेदनशील और तत्काल प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। सवाल यह है कि क्या एक छात्रा की जान की कीमत सत्ता की सुविधा से कम थी?

सोशल मीडिया पर 2–3 दिन तक लगातार आक्रोश फूटता रहा। लोग न्याय की मांग करते रहे, परिवार की पीड़ा सामने आती रही, लेकिन सरकार की चुप्पी और भी ज्यादा चुभती रही। अंततः जब दबाव बढ़ा, तब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एंजेल के पिता से फोन पर बात की। इस बातचीत को सरकारी एजेंसियों ने संवेदना और सख्ती के संदेश के रूप में पेश किया, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि यह कदम बहुत देर से उठाया गया। सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या अगर सोशल मीडिया पर गुस्सा न भड़कता, तो क्या यह “संवेदना कॉल” होती भी?

मुख्यमंत्री ने अपराध को “दुर्भाग्यपूर्ण” बताया, सख्त कार्रवाई और कठोर सजा की बात कही, लेकिन यह वही घिसे-पिटे वाक्य हैं जो हर बड़े हादसे के बाद दोहराए जाते हैं। एंजेल के परिवार के लिए यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि जीवन भर का घाव है। ऐसे में शब्दों से ज्यादा जरूरी था त्वरित कार्रवाई, पारदर्शी जांच और यह भरोसा कि राज्य में पढ़ने आए बाहरी छात्रों की सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता है—जो इस पूरे घटनाक्रम में नज़र नहीं आया।

यह मामला सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि संवेदनशील शासन का भी है। जब एक छात्रा पर हमला होता है, वह ज़िंदगी से जूझती है और अंततः दम तोड़ देती है, तब मुख्यमंत्री का रोल सिर्फ बाद में बयान देने तक सीमित नहीं होना चाहिए। सवाल अब यह नहीं है कि फोन कॉल में क्या कहा गया, सवाल यह है कि सरकार पहले क्यों नहीं बोली, पहले क्यों नहीं जागी और पहले क्यों नहीं हरकत में आई? एंजेल चकमा की मौत ने उत्तराखंड सरकार के दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई को एक बार फिर उजागर कर दिया है।

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