एबीसी डेस्क 28 दिसंबर 2025
देश में नफरत की राजनीति किसी एक बयान या किसी एक नेता तक सीमित नहीं रह गई है। यह एक पूरी श्रृंखला बन चुकी है—ऊपर से नीचे तक। जब खुद प्रधानमंत्री चुनाव प्रचार में कहते हों कि “दंगाई कपड़ों से पहचाने जाते हैं,” कभी “माताओं-बहनों के मंगलसूत्र छीने जाएंगे,” कभी “बिजली-पानी काट देंगे, तार और नल की टोटियां तक ले जाएंगे,” तो यह साफ हो जाता है कि भाषा की यह गिरावट संयोग नहीं, रणनीति है। इसी माहौल में अनुराग ठाकुर जैसे नेता “गोली मारो…” जैसे नारे लगवाते हैं, संसद में बीजेपी सांसद खुलेआम “कटुआ” जैसे अपमानजनक शब्द बोलते हैं, और अब पश्चिम बंगाल बीजेपी के नेता सुवेंदु अधिकारी कहते हैं कि “भारत सरकार को मुसलमानों के साथ वही सलूक करना चाहिए जैसा इज़राइल ने ग़ाज़ा के साथ किया।” इसके बावजूद पार्टी की तरफ से न कोई फटकार, न कोई माफी, न कोई कार्रवाई—बस गहरी, सुनियोजित चुप्पी।
सुवेंदु अधिकारी का यह बयान कोई हल्की टिप्पणी नहीं है। ग़ाज़ा में जो हुआ, वह पूरी दुनिया ने देखा—हज़ारों मासूम बच्चों, महिलाओं और बुज़ुर्गों की मौत, अस्पतालों और स्कूलों का तबाह होना, पूरा इलाका मलबे में तब्दील। उस तबाही को भारत के करोड़ों मुसलमानों के लिए “मॉडल” बताना न सिर्फ नफरत है, बल्कि सामूहिक हिंसा को正 ठहराने की खतरनाक सोच है। यह बयान देश की आत्मा, संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा हमला है।
वरिष्ठ पत्रकार नरेंद्र नाथ मिश्रा ने इस प्रवृत्ति पर गंभीर चेतावनी देते हुए लिखा है कि जब तक बीजेपी ऐसे बड़बोले और ज़हरीली भाषा बोलने वाले नेताओं को संरक्षण देती रहेगी और सोशल मीडिया पर उन्मादी भीड़ को खुली छूट मिलती रहेगी, तब तक भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। देश के भीतर तालियां बटोरने वाली यह भाषा, बाहर भारत की छवि को असहिष्णु, उग्र और विभाजित राष्ट्र के रूप में पेश करती है—जिसकी कीमत कूटनीति, अर्थव्यवस्था और वैश्विक भरोसे के रूप में चुकानी पड़ती है।
पूर्व सांसद कीर्ति आज़ाद ने इस पूरे मामले में सत्ता से सीधा और असहज सवाल पूछा है। उन्होंने याद दिलाया कि 26 दिसंबर 2025 को NDTV के कार्यक्रम में यह बयान दिया गया, लेकिन उसके बाद क्या हुआ? न कोई एफआईआर, न गिरफ्तारी, न मुकदमा, न कोई जांच। वही देश है, वही कानून है—लेकिन उसका इस्तेमाल सबके लिए बराबर नहीं। जब कोई छात्र, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता या सरकार से सवाल पूछने वाला नागरिक कुछ लिख देता है, तो UAPA, देशद्रोह और जेल का रास्ता तुरंत खुल जाता है। लेकिन जब सत्ता पक्ष का नेता खुलेआम हिंसा और नरसंहार की भाषा बोलता है, तो कानून आंख मूंद लेता है।
वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की टिप्पणी इस चुप्पी की असली तस्वीर दिखाती है। उनका सवाल सीधा है—“प्रधानमंत्री को यह सब दिखाई नहीं देता क्या? क्या यही भाषा है? और जब चुनाव आते हैं तो इसी भाषा में वोट मांगे जाते हैं।” यह सिर्फ एक बयान पर प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस पूरे सत्ता तंत्र पर सवाल है जो या तो इस भाषा से सहमत है या फिर उसे रोकने की इच्छाशक्ति खो चुका है।
असल सवाल यह नहीं है कि सुवेंदु अधिकारी ने क्या कहा। असल सवाल यह है कि उन्हें यह कहने की हिम्मत कैसे हुई और उसके बाद भी वे कानून से ऊपर कैसे बने हुए हैं? नफरत फैलाने वालों पर कानून की नजर कमजोर क्यों पड़ जाती है? क्या भारत में संविधान से बड़ा चुनावी फायदा हो गया है? क्या ग़ाज़ा जैसी तबाही की कल्पना करने वालों को भी राजनीतिक संरक्षण मिलता रहेगा?
यह मामला अब सिर्फ राजनीति का नहीं, भारत के लोकतंत्र और सामाजिक ताने-बाने की परीक्षा है। क्योंकि नफरत की आग किसी एक समुदाय तक नहीं रुकती—वह पूरे देश को जला देती है। और सत्ता की यह चुप्पी अब मासूम नहीं रही; यह खुद लोकतंत्र के खिलाफ खड़ा एक खतरनाक बयान बन चुकी है।




