Home » National » ओपिनियन | कांग्रेस के घर में बीजेपी की पंचायत, संसद में बहस से भगदड़
कांग्रेस के घर में बीजेपी की पंचायत

ओपिनियन | कांग्रेस के घर में बीजेपी की पंचायत, संसद में बहस से भगदड़

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

एबीसी डेस्क 28 दिसंबर 2025

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह की X पोस्ट को लेकर मचा सियासी शोर दरअसल उस बेचैनी का नतीजा है, जो राहुल गांधी के लोकसभा में नेता विपक्ष बनने के बाद बीजेपी के भीतर साफ दिखाई देने लगी है। सवाल यह नहीं है कि दिग्विजय सिंह ने क्या कहा, असली सवाल यह है कि कांग्रेस के अंदरूनी विमर्श पर पंचायत बैठाने वाली बीजेपी आखिर होती कौन है? जिस पार्टी में सवाल पूछना गुनाह हो, जहां असहमति का मतलब राजनीतिक वनवास हो—वह पार्टी आज लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने निकली है। यह विडंबना नहीं, राजनीतिक बेशर्मी है।

कांग्रेस एक लोकतांत्रिक दल है—यहां छोटे से छोटा कार्यकर्ता और वरिष्ठ से वरिष्ठ नेता अपनी बात रखने का हक़ रखता है। यही वजह है कि कांग्रेस में बहस होती है, मतभेद उभरते हैं, कभी-कभी बातें अनुशासनहीनता की सीमा तक भी चली जाती हैं। यह कमजोरी नहीं, लोकतंत्र की कीमत है। कांग्रेस अपने अंदर उठने वाले सवालों से डरती नहीं, उन्हीं सवालों से खुद को तराशती है। इसके उलट, बीजेपी में “अनुशासन” का मतलब है—चुप्पी, सिर झुकाना और ऊपर से आए आदेश को बिना सवाल मान लेना। वहां जो ज़रा-सा भी अलग सुर में बोले, उसका करियर खत्म कर दिया जाता है। ऐसे में कांग्रेस के खुले विमर्श पर उंगली उठाना, दरअसल बीजेपी की अपनी कुंठा का प्रदर्शन है।

बीजेपी यह शोर मचा रही है कि दिग्विजय सिंह की पोस्ट राहुल गांधी के खिलाफ “खुला असंतोष” है। लेकिन बीजेपी यह नहीं बताती कि राहुल गांधी के नेता विपक्ष बनने के बाद संसद में खुद बीजेपी क्यों बहस से भागती नज़र आ रही है? सच यह है कि अब हालात यह हो गए हैं कि नरेंद्र मोदी की हिम्मत संसद में आकर सवालों का सामना करने की नहीं होती। प्रधानमंत्री की कुर्सी खाली रहती है, और सामने आते हैं मंत्री और प्रवक्ता—घिसे-पिटे जुमलों के साथ। वरिष्ठ नेताओं की ज़बान लड़खड़ाने लगती है, हाथ कांपने लगते हैं, जब राहुल गांधी खड़े होकर बोलना शुरू करते हैं। यही वजह है कि बहस से पहले शोर, हंगामा और कार्यवाही ठप कराने की रणनीति अपनाई जाती है—ताकि सवालों से बचा जा सके।

बीजेपी बार-बार यह जताने की कोशिश करती है कि वह राहुल गांधी को “सीरियसली नहीं लेती”। लेकिन अगर ऐसा है, तो फिर पूरी बीजेपी मशीनरी—56 मंत्री, दर्जनों प्रवक्ता, आईटी सेल और गोदी मीडिया—दिन-रात राहुल गांधी के पीछे क्यों लगी रहती है? अगर राहुल गांधी अप्रासंगिक होते, तो उनके हर भाषण के बाद बीजेपी को सफाई देने, पलटवार करने और चरित्र हनन की मुहिम चलाने की ज़रूरत क्यों पड़ती? सच तो यह है कि तथाकथित “56 इंच चौड़ी छाती वाले, नॉन-बायोलॉजिकल विश्वगुरु” को भी यह एहसास है कि राहुल गांधी सवाल पूछते हैं—और सवाल सत्ता को सबसे ज़्यादा डराते हैं।

यह भी मानना पड़ेगा कि कांग्रेस को अपने घर में झांकने की ज़रूरत है। पार्टी को यह पहचानना होगा कि कहीं उसके अंदर ऐसे लोग तो नहीं हैं, जो बीजेपी के पे-रोल पर पलते हुए स्लीपर सेल की तरह काम कर रहे हैं—जो लोकतांत्रिक बहस की आड़ में भ्रम और अविश्वास फैलाते हैं। लेकिन यह निर्णय कांग्रेस को करना है, बीजेपी को नहीं। बीजेपी का काम विपक्ष को उपदेश देना नहीं, संसद में सवालों का जवाब देना है—जिससे वह लगातार बचती रही है।

दिग्विजय सिंह ने साफ कहा है कि उनकी बात संगठनात्मक आत्ममंथन से जुड़ी थी, न कि बीजेपी या RSS की विचारधारा की तारीफ से। लेकिन बीजेपी ने इसे कांग्रेस में टूट का सबूत बताकर राजनीतिक रोटियां सेंकने की कोशिश की। यह कोशिश दरअसल बीजेपी की उस घबराहट को उजागर करती है, जो एक मजबूत, मुखर और सवाल पूछने वाले विपक्ष से पैदा होती है।

यह विवाद सिर्फ एक X पोस्ट का नहीं है। यह लोकतंत्र बनाम तानाशाही, बहस बनाम भगदड़, और सवाल बनाम चुप्पी की लड़ाई है। कांग्रेस में कमियां हैं, मतभेद हैं—लेकिन वहीं उसकी लोकतांत्रिक ताकत भी है। जबकि बीजेपी का केंद्रीकृत ढांचा ऊपर से भले मजबूत दिखे, अंदर से सवालों से डरता है। और यही डर आज संसद से लेकर सोशल मीडिया तक, हर जगह साफ झलक रहा है।

5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments