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SIR: वोटर लिस्ट की सफ़ाई या अधिकारों की कसौटी?

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अवधेश कुमार | नई दिल्ली 27 दिसंबर 2025

भारत में चुनाव सिर्फ वोट डालने का दिन नहीं होता, बल्कि उससे पहले की तैयारी भी उतनी ही अहम होती है। इन्हीं तैयारियों में सबसे ज़रूरी काम है — मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) को सही रखना। इसी उद्देश्य से चुनाव आयोग समय-समय पर विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision – SIR) करता है। इसका मकसद साफ़ है — जिन लोगों का निधन हो चुका है, जो जगह बदल चुके हैं या जिनके नाम दो जगह दर्ज हैं, उन्हें हटाकर वोटर लिस्ट को शुद्ध बनाया जाए। बात सुनने में बिल्कुल सही लगती है, लेकिन ज़मीन पर इसका असर कई आम लोगों के लिए चिंता का कारण बन रहा है।

SIR के तहत जब नई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट आती है, तो कई लोगों को अचानक पता चलता है कि उनका नाम सूची से गायब है। इनमें दिहाड़ी मज़दूर, प्रवासी कामगार, किराए पर रहने वाले लोग, बुज़ुर्ग और ऐसे लोग भी होते हैं जो डिजिटल प्रक्रिया से ज़्यादा परिचित नहीं हैं। ऐसे में उन्हें कहा जाता है कि वे अपील करें, लेकिन यहीं से दूसरा बड़ा सवाल खड़ा होता है — सिंगल-अपील विंडो, यानी सिर्फ़ एक बार अपील करने का मौका।

आम आदमी की ज़िंदगी में सरकारी दफ़्तर और काग़ज़ी प्रक्रिया आज भी आसान नहीं है। कई बार जानकारी देर से मिलती है, कई बार फॉर्म भरने में गलती हो जाती है, तो कभी दस्तावेज़ पूरे नहीं होते। ऐसे में अगर अपील का सिर्फ़ एक ही मौका मिले और वह किसी वजह से चूक जाए, तो मतदाता का सबसे बुनियादी हक़ — वोट देने का अधिकार — खतरे में पड़ जाता है। यह वही अधिकार है, जो संविधान ने हर नागरिक को दिया है।

चुनाव आयोग का कहना है कि यह व्यवस्था पारदर्शिता और तेज़ी के लिए ज़रूरी है, ताकि प्रक्रिया लंबी न खिंचे और वोटर लिस्ट समय पर तैयार हो सके। यह बात अपनी जगह सही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या तेज़ी के नाम पर इंसान की आवाज़ कमज़ोर पड़ जानी चाहिए? लोकतंत्र सिर्फ़ नियमों से नहीं, लोगों की भागीदारी से मजबूत होता है।

अगर वोटर लिस्ट की सफ़ाई एक “दरवाज़ा” है, तो अपील का मौका “खिड़की” होना चाहिए — खुली, रोशनी देने वाली और सबके लिए सुलभ। लेकिन जब खिड़की बहुत छोटी हो जाए और दरवाज़ा भारी, तो आम आदमी खुद को बाहर खड़ा महसूस करता है।

इसलिए ज़रूरत है कि SIR जैसी प्रक्रियाओं के साथ जागरूकता बढ़ाई जाए, अपील की प्रक्रिया को और मानवीय, सरल और लचीला बनाया जाए, ताकि कोई भी नागरिक सिर्फ़ तकनीकी कारणों से अपने वोट के अधिकार से वंचित न हो। आखिरकार, लोकतंत्र का मतलब यही है — हर आवाज़ की गिनती।

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