सुमन कुमार | नई दिल्ली 26 दिसंबर 2025
उन्नाव रेप कांड कोई पुरानी फाइल नहीं, बल्कि आज भी धड़कता हुआ ज़ख़्म है। यह उस नाबालिग लड़की और उसके परिवार की कहानी है, जिसने 2017 में हुए अपहरण और बलात्कार के बाद सिर्फ़ आरोपी से नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम से लड़ाई लड़ी। जिस उम्र में सपने पलते हैं, उस उम्र में उसकी ज़िंदगी डर, धमकियों और अदालतों के चक्कर में उलझ गई। आरोपी कोई आम आदमी नहीं था—वह सत्ता की ताक़त से लैस कुलदीप सिंह सेंगर था। लेकिन पीड़िता ने हार नहीं मानी। उसने अपनी आवाज़ उठाई, तब भी जब पुलिस ने अनसुना किया, तब भी जब उसे चुप कराने की कोशिशें हुईं।
यह लड़ाई सिर्फ़ अदालत की नहीं थी, यह अस्तित्व की लड़ाई थी। पीड़िता के पिता की पुलिस हिरासत में मौत ने इस परिवार की रीढ़ तोड़ दी, लेकिन हौसला नहीं। आत्मदाह के प्रयास ने पूरे देश को झकझोरा, तब जाकर सिस्टम हरकत में आया। सीबीआई जांच हुई, मुक़दमा चला और आखिरकार अदालत ने सेंगर को दोषी ठहराया। उम्रकैद की सज़ा मिली—काग़ज़ पर यह न्याय था, लेकिन ज़मीन पर पीड़िता की ज़िंदगी अब भी चैन से दूर रही। सुरक्षा, रोज़मर्रा का डर, सामाजिक बहिष्कार और मानसिक आघात—यह सब सज़ा के बाद भी खत्म नहीं हुआ।
अब, आठ साल बाद जब सज़ा निलंबन और जमानत जैसे फैसले सामने आते हैं, तो पीड़िता का डर फिर लौट आता है। उसके लिए यह कोई तकनीकी आदेश नहीं, बल्कि हर रात का डर है—कि कहीं न्याय फिर से फिसल न जाए। परिवार कहता है कि दोषी सलाख़ों के पीछे हो, तभी उन्हें नींद आती है। उनके लिए यह सवाल सिर्फ़ कानून का नहीं, इंसानियत का है। क्या एक नाबालिग के साथ हुए जघन्य अपराध में दोषी को राहत देना पीड़िता की पीड़ा को नज़र अंदाज़ करना नहीं है?
यह मामला हमें आईना दिखाता है—कि न्याय सिर्फ़ फ़ैसलों से पूरा नहीं होता, पीड़ित के मन में सुरक्षा की भावना से पूरा होता है। उन्नाव की बेटी आज भी पूछ रही है: क्या दोषी को सज़ा मिलना काफ़ी है, या पीड़िता को भयमुक्त जीवन देना भी न्याय का हिस्सा है? यह सवाल पूरे समाज से है, हर उस आदमी से है जो इंसाफ़ की बात करता है। जब तक पीड़िता सुरक्षित नहीं, तब तक न्याय अधूरा है—और उन्नाव की यह कहानी हमें यही सिखाती है कि कानून की जीत तभी मानी जाएगी, जब इंसानियत भी जीते।




