महेंद्र कुमार | नई दिल्ली 26 दिसंबर 2025
दिल्ली से सामने आए वीडियो केवल कुछ भड़काऊ शब्दों का मामला नहीं है। इस देश की आत्मा, संविधान और सामाजिक ताने-बाने पर सीधा हमला है। वीडियो में “गुरिल्ला वॉर”, “गुप्त लड़ाई”, “जिम्मेदारी छुपाने” जैसी भाषा अगर सच है, तो यह खुली चेतावनी है कि कुछ लोग लोकतंत्र को खोखला करने और समाज को हिंसा की आग में झोंकने का दुस्साहस कर रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि वीडियो किस पार्टी या किस नेता से जुड़ा है—सवाल यह है कि क्या भारत में नफरत को हथियार बनाकर युद्ध की मानसिकता फैलाने की इजाज़त दी जा सकती है? वीडियो में मुसलमानों के खिलाफ जिस तरह की भाषा इस्तेमाल होने का दावा किया जा रहा है, वह केवल एक समुदाय को डराने की कोशिश नहीं, पूरे देश को अस्थिर करने की साजिश की तरह दिखती है। “गुरिल्ला वॉर” जैसे शब्द किसी चाय की दुकान की गपशप नहीं होते—यह शब्द खून, हिंसा और अराजकता की सोच से पैदा होते हैं। अगर इस तरह की बातें सचमुच किसी बैठक में हुई हैं, तो यह सीधे-सीधे देश की कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती है।
यह भी उतना ही चिंताजनक है कि ऐसे वीडियो सामने आने के बावजूद अब तक कोई ठोस, स्पष्ट और पारदर्शी सरकारी प्रतिक्रिया नहीं दिखती। चुप्पी सवाल पैदा करती है। क्या नफरत फैलाने वालों को इसलिए छूट मिल रही है क्योंकि वे “अपनों” में गिने जाते हैं? क्या कानून केवल कमजोरों के लिए है और ताकतवर नफरत फैलाकर भी बच निकलेंगे? यह चुप्पी पीड़ितों के डर को और गहरा करती है।
सोशल मीडिया पर सामने आए बयान, जिनमें एक भारतीय मुस्लिम नागरिक ने डर, मॉब लिंचिंग, तथाकथित “लव जिहाद”, “स्पिट जिहाद” और जबरन धार्मिक नारे लगवाने की बात कही है, कोई विदेशी प्रोपेगैंडा नहीं हैं—ये ज़मीनी सच्चाइयों से उपजी आवाज़ें हैं। जब लोग संयुक्त राष्ट्र तक गुहार लगाने को मजबूर हों, तो यह देश के भीतर भरोसे के टूटने का संकेत है। यह भारत की छवि का भी सवाल है, जहां संविधान हर आदमी को बराबरी और सुरक्षा का भरोसा देता है।
अब जरूरत किसी राजनीतिक बचाव या बयानबाज़ी की नहीं, बल्कि तत्काल और सख्त कार्रवाई की है। जिन वीडियो की बात हो रही है, उनकी फॉरेंसिक जांच होनी चाहिए। संदर्भ साफ किया जाना चाहिए। अगर वीडियो असली हैं, तो जिन लोगों ने नफरत, हिंसा और “गुप्त युद्ध” की भाषा बोली है, उन पर बिना किसी राजनीतिक दबाव के कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। नफरत फैलाना अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं, बल्कि अपराध है—और अपराध पर कार्रवाई होनी ही चाहिए।
आक्रोश जायज़ है, लेकिन यह खबर बदले या हिंसा की नहीं, इंसाफ की मांग करती है। यह मांग करती है कि भारत को नफरत के प्रयोगशाला में बदलने की कोशिश करने वालों को साफ संदेश दिया जाए—यह देश युद्ध की भाषा नहीं, संविधान की भाषा समझता है। शांति, सुरक्षा और गरिमा किसी एक समुदाय की नहीं, हर आदमी का अधिकार है। और जो लोग इस अधिकार को कुचलने की साजिश रचते हैं, उनके खिलाफ अब सिर्फ निंदा नहीं, निर्णायक कार्रवाई वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है।




