उत्तराखंड | विशेष रिपोर्ट : आलोक कुमार | 24 दिसंबर 2025
उत्तराखंड का बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड एक बार फिर देश की राजनीति, प्रशासन और न्याय व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े कर रहा है। यह मामला सिर्फ एक युवती की हत्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम की परतें खोलता है, जहां ताक़त, रसूख और पद के सामने सच कई बार दबता हुआ दिखाई देता है। अदालत द्वारा मुख्य आरोपियों को सज़ा दिए जाने के बावजूद, इस केस की सबसे अहम और संवेदनशील कड़ी — कथित VVIP गेस्ट — आज भी रहस्य बनी हुई है। यही कारण है कि यह मामला समय-समय पर फिर उभरता है और समाज के ज़मीर को झकझोर देता है।
अंकिता भंडारी एक साधारण परिवार की बेटी थी, जो रोज़गार के लिए ऋषिकेश के पास स्थित एक रिज़ॉर्ट में काम कर रही थी। वह न किसी राजनीति का हिस्सा थी, न किसी साज़िश का। जांच में सामने आया कि उस पर रिज़ॉर्ट में ठहरे एक प्रभावशाली मेहमान को “स्पेशल सर्विस” देने का दबाव बनाया गया था। अंकिता ने अपने आत्मसम्मान और गरिमा के साथ समझौता करने से इनकार किया। यही इनकार कथित तौर पर उसकी मौत की वजह बना। 18 सितंबर 2022 को उसकी हत्या कर शव चीला नहर में फेंक दिया गया। जब उसका शव मिला, तो पूरा देश सन्न रह गया। सड़कों पर आक्रोश था, सोशल मीडिया पर सवाल थे और हर किसी की ज़ुबान पर यही बात थी कि क्या इस केस में किसी बड़े और ताक़तवर चेहरे को बचाया जा रहा है।
जांच के दौरान रिज़ॉर्ट मालिक पुलकित आर्य और उसके दो सहयोगियों की गिरफ्तारी हुई। मुकदमा चला और अदालत ने उन्हें सज़ा सुनाई। यह न्याय की दिशा में एक ज़रूरी कदम था, लेकिन इसके बावजूद जनता और पीड़ित परिवार के मन में यह भावना बनी रही कि न्याय अधूरा है। क्योंकि चार्जशीट और जांच में बार-बार जिस “VVIP गेस्ट” का ज़िक्र हुआ, उसका नाम कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। न यह स्पष्ट हुआ कि उससे कितनी पूछताछ हुई, न यह कि उसकी भूमिका की गहराई से जांच क्यों नहीं हुई। यहीं से इस केस पर सवालों की छाया और गहरी होती चली गई।
इस मामले में सबसे ज़्यादा विवाद उस समय हुआ, जब घटना के कुछ ही समय बाद प्रशासन ने रिज़ॉर्ट पर बुलडोज़र चला दिया। सरकार ने इसे अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई बताया, लेकिन विपक्ष और सामाजिक संगठनों ने आरोप लगाया कि यह कदम जल्दबाज़ी में उठाया गया ताकि संभावित सबूत नष्ट हो जाएं। सवाल यह भी उठा कि क्या फॉरेंसिक जांच पूरी होने से पहले ही ढांचा गिरा देना सही था? क्या हर कमरे, हर रजिस्टर, हर डिजिटल रिकॉर्ड की ठीक से जांच हुई थी? यही वजह है कि बुलडोज़र की कार्रवाई आज भी इस केस का सबसे विवादास्पद पहलू बनी हुई है।
अब, करीब दो साल बाद, यह मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। हरिद्वार ज्वालापुर के पूर्व विधायक सुरेश राठौर की कथित दूसरी पत्नी उर्मिला सनावर ने फेसबुक लाइव आकर बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा है कि अंकिता भंडारी केस में जिस VVIP गेस्ट का नाम लंबे समय से छुपा हुआ है, वह कोई और नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व राज्यसभा सांसद दुष्यंत कुमार गौतम हैं। इस बयान के सामने आते ही राजनीतिक हलकों में हड़कंप मच गया। सोशल मीडिया पर बहस तेज़ हो गई और एक बार फिर लोगों ने पूछा कि अगर आरोप गलत हैं, तो इनकी निष्पक्ष जांच से डर क्यों?
इन आरोपों के बाद कांग्रेस ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उत्तराखंड की धामी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि इस पूरे मामले में सबूतों से छेड़छाड़ की गई और प्रभावशाली लोगों को बचाने की कोशिश हुई। पार्टी ने दावा किया कि बुलडोज़र कार्रवाई से लेकर जांच की दिशा तक, हर कदम इस तरह उठाया गया कि असली सच सामने न आ सके। कांग्रेस ने इस मामले की दोबारा स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए कहा कि जब तक VVIP गेस्ट की भूमिका की निष्पक्ष जांच नहीं होती, तब तक अंकिता को सच्चा न्याय नहीं मिल सकता।
इस पूरे विवाद के बीच उर्मिला सनावर ने आरती गॉड नाम की एक अन्य नेता का भी ज़िक्र किया। इसके तुरंत बाद आरती गॉड का भाजपा से इस्तीफा देना कई सवालों को जन्म देता है। हालांकि इस्तीफे की वजह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं की गई है, लेकिन राजनीति में समय और घटनाओं का संयोग अक्सर अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है। इस इस्तीफे ने इस पूरे मामले को और पेचीदा बना दिया है।
अंकिता भंडारी का परिवार आज भी न्याय की उम्मीद में जी रहा है। हर नया बयान, हर नया आरोप उनके ज़ख्मों को फिर से हरा कर देता है। एक पिता, जो अपनी बेटी के लिए इंसाफ चाहता है, और एक मां, जिसकी आंखों में आज भी सवाल हैं — क्या उनकी बेटी की मौत की पूरी सच्चाई कभी सामने आएगी? यह मामला अब सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि संवेदना, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी का भी बन चुका है।
सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है — वह VVIP गेस्ट कौन था? अगर आरोप बेबुनियाद हैं, तो निष्पक्ष जांच से सच्चाई सामने क्यों नहीं लाई जाती? और अगर आरोपों में सच्चाई है, तो कानून की पकड़ वहां तक अब तक क्यों नहीं पहुंची? जब तक इन सवालों के साफ़ और ईमानदार जवाब नहीं मिलते, तब तक अंकिता भंडारी हत्याकांड एक खुला ज़ख्म बना रहेगा — न सिर्फ उसके परिवार के लिए, बल्कि पूरे समाज और लोकतंत्र के लिए।




