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युवती नौकरी ठुकरा दे या नरक में जाए, नीतीश जी ने कुछ गलत नहीं किया : गिरिराज सिंह

एबीसी डेस्क 18 दिसंबर 2025

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के एक बयान ने देश की राजनीति और समाज दोनों को झकझोर कर रख दिया है। उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के उस वायरल वीडियो को लेकर कहा कि “युवती नौकरी ठुकरा दे या नरक में जाए, नीतीश जी ने कुछ गलत नहीं किया।” यह बयान ऐसे समय आया है, जब पूरे देश में नीतीश कुमार के व्यवहार को लेकर सवाल उठ रहे हैं। वीडियो में साफ दिखाई देता है कि एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने नुसरत परवीन नाम की एक युवती का बुर्का खींच दिया, और वह भी सार्वजनिक मंच पर, कैमरों के सामने। यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि सत्ता, अहंकार और महिलाओं के सम्मान पर गहरी चोट की तरह देखा जा रहा है।

इस पूरे मामले ने इसलिए भी ज्यादा तूल पकड़ लिया है, क्योंकि जिस पद पर बैठा व्यक्ति यह हरकत कर रहा है, वह राज्य का मुख्यमंत्री है। एक ऐसा पद, जिससे संवैधानिक मर्यादा, संवेदनशीलता और उदाहरण की उम्मीद की जाती है। सवाल यह नहीं है कि युवती कौन थी या वह किस धर्म की थी। सवाल यह है कि क्या किसी महिला के कपड़े छूना, खींचना या उसके पहनावे पर सार्वजनिक टिप्पणी करना किसी भी हाल में जायज़ हो सकता है? और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब इस पर आपत्ति उठी, तो उसके जवाब में एक केंद्रीय मंत्री यह कहें कि “कुछ गलत नहीं हुआ”, तो यह सोच समाज को किस दिशा में ले जा रही है?

गिरिराज सिंह का बयान सिर्फ नीतीश कुमार का बचाव नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता का खुला प्रदर्शन है, जिसमें महिलाओं की गरिमा को सत्ता के नीचे कुचल दिया जाता है। “नौकरी ठुकरा दे या नरक में जाए” जैसे शब्द किसी सड़कछाप बहस के नहीं, बल्कि देश के केंद्रीय मंत्री के हैं। यह बयान न सिर्फ असंवेदनशील है, बल्कि यह साफ दिखाता है कि सत्ता में बैठे कुछ लोग महिलाओं को व्यक्ति नहीं, बल्कि आदेश मानने वाली वस्तु समझते हैं। अगर वह महिला विरोध करती है, तो उसे नौकरी छोड़ने या “नरक जाने” की धमकी दी जाती है — यही है सत्ता का असली चेहरा।

यह मामला अब सिर्फ नीतीश कुमार के व्यवहार तक सीमित नहीं रहा। यह उस राजनीतिक गठजोड़ और सत्ता-संरक्षण की कहानी बन गया है, जिसमें गलत को भी सही ठहराया जाता है, बस इसलिए क्योंकि आरोपी “अपना” है। अगर यही काम किसी आम अफसर, शिक्षक या आम आदमी ने किया होता, तो क्या उसे भी इसी तरह माफ कर दिया जाता? या तब नैतिकता, कानून और मर्यादा की बातें की जातीं? यह दोहरा चरित्र ही जनता को सबसे ज्यादा चुभ रहा है।

सबसे दुखद पहलू यह है कि इस पूरे विवाद में महिला की भावनाओं, उसकी गरिमा और उसकी आवाज़ कहीं गुम हो गई है। कोई यह नहीं पूछ रहा कि उस युवती ने उस पल क्या महसूस किया। सार्वजनिक मंच पर उसका बुर्का खींचे जाने का मतलब सिर्फ कपड़े का खिंचना नहीं था, बल्कि उसकी निजी सीमा का उल्लंघन था। और जब सत्ता इस उल्लंघन को सही ठहराने लगे, तो यह सिर्फ एक महिला का अपमान नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए खतरे की घंटी है।

आज सवाल सिर्फ नीतीश कुमार या गिरिराज सिंह का नहीं है। सवाल यह है कि क्या सत्ता में बैठे लोग कानून और नैतिकता से ऊपर हैं? क्या महिलाओं का सम्मान सिर्फ भाषणों और महिला दिवस तक सीमित रह गया है? और क्या ऐसे बयानों के बाद भी हम यह कह सकते हैं कि देश सुरक्षित और संवेदनशील हाथों में है? यह घटना और उस पर आया बयान जवाब नहीं, बल्कि और ज्यादा सवाल छोड़ गया है — ऐसे सवाल, जिनसे अब बचा नहीं जा सकता।

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