आलोक कुमार। नई दिल्ली 18 दिसंबर 2025
दुनिया इस समय शांति के दौर में नहीं है। कहीं युद्ध चल रहा है, कहीं आर्थिक संकट है, कहीं महंगाई और बेरोज़गारी लोगों की कमर तोड़ रही है। ऐसे हालात में जब देशों के बीच भरोसा कम होता जा रहा है, तभी ब्रिक्स जैसे मंच की अहमियत और बढ़ जाती है। ब्रिक्स कोई साधारण संगठन नहीं है, बल्कि यह उन देशों का समूह है जो पश्चिमी ताक़तों से अलग अपनी पहचान, अपनी सोच और अपनी राह बनाना चाहते हैं। अब इस समूह की अध्यक्षता ब्राज़ील से निकलकर भारत के हाथ में आ गई है, और इसके साथ ही भारत पर सिर्फ़ एक पद नहीं, बल्कि दुनिया की बड़ी उम्मीदों का बोझ भी आ गया है।
ब्राज़ील ने औपचारिक रूप से ब्रिक्स की कमान भारत को सौंप दी है। यह एक सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया ज़रूर लग सकती है, लेकिन इसके मायने बहुत गहरे हैं। आज जब वैश्विक संस्थाएं जैसे संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और IMF पर अमीर देशों का दबदबा होने के आरोप लगते हैं, तब भारत से यह उम्मीद की जा रही है कि वह ब्रिक्स को विकासशील और गरीब देशों की असली आवाज़ बना सके। यह जिम्मेदारी इसलिए भी बड़ी है क्योंकि ब्रिक्स अब सिर्फ़ पांच देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके दायरे और महत्व दोनों बढ़ते जा रहे हैं।
भारत से उम्मीदें: सिर्फ़ ताक़त नहीं, समझदारी भी
भारत को ब्रिक्स की अध्यक्षता ऐसे समय मिली है जब दुनिया दो ध्रुवों में बंटी हुई दिखाई देती है। एक तरफ़ पश्चिमी देश हैं, दूसरी तरफ़ उभरती अर्थव्यवस्थाएं। इन दोनों के बीच टकराव भी है और अविश्वास भी। ऐसे माहौल में भारत की भूमिका सिर्फ़ नेतृत्व करने की नहीं, बल्कि संतुलन बनाने वाले देश की भी है। भारत को ऐसा देश माना जाता है जो बातचीत में विश्वास रखता है, टकराव में नहीं। यही वजह है कि भारत से उम्मीद की जा रही है कि वह ब्रिक्स को आक्रामक मंच नहीं, बल्कि संवाद और समाधान का मंच बनाएगा।
भारत पहले भी “वसुधैव कुटुंबकम” यानी पूरी दुनिया को एक परिवार मानने की बात करता रहा है। अब इस सोच को व्यवहार में उतारने की परीक्षा है। जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा संकट, खाद्य सुरक्षा, कर्ज़ में डूबे देश और तकनीक की असमान पहुंच — ये ऐसे मुद्दे हैं जिनसे आम आदमी सीधे प्रभावित होता है। भारत अगर ब्रिक्स के मंच से इन मुद्दों को ईमानदारी से उठाता है, तो यह सिर्फ़ कूटनीतिक जीत नहीं होगी, बल्कि मानवता की जीत होगी।
विकास का मतलब सिर्फ़ आंकड़े नहीं, इंसानी ज़िंदगी
अक्सर अंतरराष्ट्रीय बैठकों में बड़े-बड़े आंकड़ों, निवेश और व्यापार की बातें होती हैं, लेकिन आम आदमी की ज़िंदगी वहीं की वहीं रहती है। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि ब्रिक्स को सिर्फ़ फाइलों और घोषणाओं तक सीमित न रहने दे। असली सवाल यह है कि क्या इस मंच से लिए गए फैसलों का असर अफ्रीका के किसी गांव, एशिया के किसी कस्बे या लैटिन अमेरिका के किसी किसान तक पहुंचेगा?
भारत का अनुभव यहां काम आ सकता है। भारत ने गरीबी, आबादी, संसाधनों की कमी और असमानता जैसी समस्याओं को बहुत करीब से देखा है। इसलिए अगर भारत चाहे, तो ब्रिक्स के ज़रिये यह दिखा सकता है कि विकास का मतलब सिर्फ़ GDP नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन, रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य भी है। यही मानवीय सोच भारत को बाकी देशों से अलग बनाती है।
आगे की राह: चुनौती भी, अवसर भी
यह सच है कि भारत के लिए यह राह आसान नहीं होगी। ब्रिक्स के भीतर भी मतभेद हैं, अलग-अलग राष्ट्रीय हित हैं और वैश्विक दबाव भी हैं। लेकिन यही असली नेतृत्व की पहचान होती है — जब कठिन हालात में भी रास्ता निकाला जाए। भारत अगर इस दौरान धैर्य, संवाद और सहयोग को प्राथमिकता देता है, तो ब्रिक्स सिर्फ़ एक संगठन नहीं रहेगा, बल्कि नई दुनिया की उम्मीद बन सकता है।
ब्राज़ील से भारत तक सत्ता की यह गद्दी सिर्फ़ हाथ बदलने की कहानी नहीं है। यह उस भरोसे की कहानी है, जो दुनिया भारत पर कर रही है। अब यह भारत पर निर्भर है कि वह इस भरोसे को सिर्फ़ भाषणों में नहीं, बल्कि ज़मीन पर महसूस होने वाले फैसलों में बदले।




