एबीसी डेस्क 17 दिसंबर 2025
भारतीय राजनीति के गलियारों में साल 2002 को लेकर एक किस्सा आज भी उतना ही रोचक है, जितना चौंकाने वाला। यह वह दौर था, जब सत्ता के शिखर पर बैठे अटल बिहारी वाजपेयी को लेकर पार्टी के भीतर ही एक बड़ा प्रयोग सोचा जा रहा था। प्लान कुछ ऐसा था कि देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को राष्ट्रपति भवन भेज दिया जाए और उनकी जगह लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री बनाया जाए। यह कोई अफवाह नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्र में चल रही गंभीर रणनीति थी।
दरअसल, उस समय भाजपा और एनडीए के भीतर यह धारणा बन रही थी कि आडवाणी संगठन, कैडर और विचारधारा के सबसे मज़बूत स्तंभ हैं। पार्टी के एक बड़े वर्ग का मानना था कि अगर अटल जी को सम्मानजनक ढंग से राष्ट्रपति बना दिया जाए, तो सरकार की कमान आडवाणी के हाथों में आ सकती है। सत्ता का संतुलन बदलेगा, निर्णय अधिक “फर्म” होंगे और पार्टी को वैचारिक बढ़त मिलेगी। काग़ज़ पर यह योजना बेहद सटीक लग रही थी — लेकिन राजनीति सिर्फ गणित नहीं होती, उसमें नैतिकता और परंपरा भी बोलती है।
यहीं से कहानी में आया सबसे दिलचस्प मोड़। अटल बिहारी वाजपेयी ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि एक चलती-फिरती सरकार के प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति बनाना संसदीय लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ होगा। अटल जी का मानना था कि राष्ट्रपति पद कोई “राजनीतिक समायोजन” का पद नहीं, बल्कि संवैधानिक गरिमा का प्रतीक है। उनका यह इनकार सिर्फ एक पद ठुकराना नहीं था, बल्कि सत्ता की राजनीति को नैतिक आईना दिखाना था।
अटल जी यहीं नहीं रुके। उन्होंने राजनीति को एक नया मोड़ देते हुए विपक्ष से संवाद का रास्ता चुना। कांग्रेस सहित अन्य दलों से बातचीत हुई और तभी सामने आया एक ऐसा नाम, जिसने पूरे देश का दिल जीत लिया — डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम। एक वैज्ञानिक, एक राष्ट्रवादी, और राजनीति से ऊपर उठकर सोचने वाला व्यक्तित्व। अटल जी ने खुद कलाम के नाम का प्रस्ताव रखा और देखते-ही-देखते यह नाम सर्वसम्मति का प्रतीक बन गया।
यही वह पल था, जब राष्ट्रपति भवन की राह बदल गई। अटल राष्ट्रपति नहीं बने, आडवाणी प्रधानमंत्री नहीं बने — लेकिन देश को मिला “मिसाइल मैन” राष्ट्रपति। यह घटना भारतीय राजनीति का वह अध्याय है, जो बताता है कि सत्ता के शतरंज में हर चाल सत्ता के लिए नहीं चलती; कुछ चालें इतिहास और मूल्यों के लिए भी चली जाती हैं।




