अंतरराष्ट्रीय डेस्क 16 दिसंबर 2025
बांग्लादेश में एक बार फिर भारत-विरोधी बयानबाज़ी ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। जैसे-जैसे देश में आम चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे इतिहास, राष्ट्रवाद और पड़ोसी देशों को लेकर सियासी बयान हथियार बनते जा रहे हैं। इसी क्रम में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के एक नेता के विवादित बयान ने न सिर्फ देश के भीतर तीखी बहस छेड़ दी है, बल्कि भारत-बांग्लादेश के संवेदनशील द्विपक्षीय रिश्तों पर भी राजनीतिक साया डाल दिया है।
ढाका में शहीद बुद्धिजीवियों की स्मृति में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान BNP की जिला इकाई के सचिव एडवोकेट अबू अल यूसुफ खान टिपू ने 1971 के ऐतिहासिक घटनाक्रम को लेकर ऐसा बयान दे दिया, जिसने दशकों से स्थापित ऐतिहासिक समझ को चुनौती दे दी। टिपू ने कहा कि 1971 में बांग्लादेश के बुद्धिजीवियों का नरसंहार केवल पाकिस्तानी सेना की करतूत नहीं था, बल्कि इसमें “एक पड़ोसी देश” की भी भूमिका थी। उनके इस बयान को सीधे तौर पर भारत की सेना और खुफिया एजेंसियों पर आरोप के रूप में देखा गया।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब बांग्लादेश 14 दिसंबर को शहीद बुद्धिजीवी दिवस और 16 दिसंबर को विजय दिवस मनाने की तैयारी कर रहा था। यह वही दौर है जब ऐतिहासिक दस्तावेजों, अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और स्वयं बांग्लादेशी न्यायिक प्रक्रियाओं ने यह स्थापित किया है कि 1971 के युद्ध के अंतिम दिनों में पाकिस्तानी सेना और उसके स्थानीय सहयोगियों ने योजनाबद्ध तरीके से शिक्षकों, पत्रकारों, डॉक्टरों, लेखकों और विचारकों की हत्या की थी—ताकि नवगठित राष्ट्र को बौद्धिक रूप से अपंग बनाया जा सके।
BNP नेता का यह दावा न केवल ऐतिहासिक तथ्यों से टकराता है, बल्कि उसे पाकिस्तान के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रुख के रूप में भी देखा जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि यह बयान 1971 की जिम्मेदारी को बांटने और पाकिस्तान की भूमिका को हल्का करने की कोशिश जैसा प्रतीत होता है, जबकि भारत की भूमिका उस युद्ध में बांग्लादेश की मुक्ति के समर्थन में ऐतिहासिक रूप से दर्ज है।
इस बयान के सामने आते ही बांग्लादेश के राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। खुद BNP को भी डैमेज कंट्रोल में उतरना पड़ा। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने तुरंत स्पष्ट किया कि टिपू का बयान उनका व्यक्तिगत विचार है और पार्टी की आधिकारिक लाइन नहीं। BNP ने यह भी कहा कि पार्टी 1971 के शहीदों के बलिदान का सम्मान करती है और किसी भी तरह से ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने का समर्थन नहीं करती।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांग्लादेश की राजनीति में भारत-विरोधी भावनाओं को चुनावी लाभ के लिए उभारना कोई नई रणनीति नहीं है। अतीत में भी अलग-अलग मौकों पर BNP और उससे जुड़े कुछ नेताओं द्वारा भारत को लेकर आक्रामक या विवादित बयान दिए जाते रहे हैं। ऐसे बयान अक्सर घरेलू असंतोष, चुनावी दबाव और सत्ता-विरोधी नैरेटिव को तेज करने के औजार के रूप में इस्तेमाल होते हैं।
दूसरी ओर, भारत-बांग्लादेश संबंध केवल कूटनीतिक शिष्टाचार तक सीमित नहीं हैं। सीमा सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी सहयोग, ऊर्जा, बिजली, व्यापार, ट्रांजिट और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे कई अहम मुद्दों पर दोनों देश एक-दूसरे पर निर्भर हैं। ऐसे में इस तरह की बयानबाज़ी भले ही औपचारिक कूटनीति को तुरंत प्रभावित न करे, लेकिन जनमत और राजनीतिक माहौल में अविश्वास की परत जरूर चढ़ा देती है।
कूटनीतिक जानकारों का कहना है कि इतिहास के संवेदनशील अध्यायों को चुनावी राजनीति में घसीटना न केवल खतरनाक है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी नुकसानदेह हो सकता है। 1971 का युद्ध केवल अतीत की घटना नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की राजनीति, सीमाओं और रिश्तों की नींव है—और उस पर सवाल उठाना पूरे विमर्श को अस्थिर कर सकता है।
कुल मिलाकर, BNP नेता का यह बयान एक बार फिर यह दिखाता है कि बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में भारत और पाकिस्तान जैसे मुद्दे आज भी भावनात्मक और रणनीतिक हथियार बने हुए हैं। सवाल यह है कि चुनावी लाभ के लिए इतिहास को किस हद तक मोड़ा जाएगा—और इसकी कीमत क्षेत्रीय भरोसे को कितनी चुकानी पड़ेगी।




