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नियम तोड़ते अमीर, ज़हर सांसों में भरते गरीब: सुप्रीम कोर्ट

अवधेश कुमार । नई दिल्ली 16 दिसंबर 2025

दिल्ली-NCR में लगातार बिगड़ते वायु प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख़्त और तल्ख़ टिप्पणी करते हुए कहा है कि पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन ज़्यादातर समर्थ और संपन्न वर्ग करता है, लेकिन उसकी कीमत गरीब और मध्यम वर्ग को अपनी सेहत से चुकानी पड़ती है। शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि समाज का एक तबका अपने आराम और जीवनशैली में ज़रा भी बदलाव करने को तैयार नहीं है, जबकि उसी जीवनशैली से पैदा हुआ ज़हर करोड़ों लोगों की सांसों में घुल रहा है।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली-NCR में वायु प्रदूषण अब केवल मौसमी समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह मानव अधिकारों से जुड़ा संकट बन चुका है। अदालत ने टिप्पणी की कि बड़े-बड़े घर, कई-कई गाड़ियां, डीज़ल-पेट्रोल से चलने वाले भारी वाहन, खुले में कचरा जलाना और नियमों की खुलेआम अवहेलना—ये सब ज़्यादातर वही लोग कर रहे हैं जिनके पास संसाधन हैं। लेकिन इसके दुष्परिणाम झुग्गियों में रहने वाले, सड़क पर काम करने वाले मज़दूर, रिक्शा चालक, छोटे दुकानदार और बच्चे झेल रहे हैं, जिनके पास न एयर प्यूरीफायर हैं और न ही इलाज के महंगे विकल्प।

अदालत ने इस बात पर भी नाराज़गी जताई कि GRAP जैसे सख़्त नियम लागू होने के बावजूद उनका पालन ज़मीन पर गंभीरता से नहीं हो रहा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर साल सर्दियों में वही बहाने, वही तर्क और वही लापरवाही दोहराई जाती है। सरकारें एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल देती हैं और अंत में जनता दमघोंटू हवा में जीने को मजबूर रह जाती है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि अगर नियम सिर्फ काग़ज़ों तक सीमित रहेंगे, तो हालात कभी नहीं बदलेंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि अमीर वर्ग की जीवनशैली बदलने की अनिच्छा इस संकट की बड़ी वजह है। अदालत के अनुसार, निजी गाड़ियों पर निर्भरता, सार्वजनिक परिवहन से दूरी, लग्ज़री सुविधाओं के नाम पर ऊर्जा की बेतहाशा खपत—ये सब पर्यावरण पर सीधा हमला हैं। लेकिन जब इन्हें नियंत्रित करने की बात आती है, तो सबसे पहले “असुविधा” का रोना शुरू हो जाता है। कोर्ट ने कहा कि पर्यावरण की कीमत पर सुविधा का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता।

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सरकारों और प्रशासन से यह भी पूछा कि आखिर नीति का बोझ हमेशा गरीबों पर ही क्यों डाला जाता है। निर्माण कार्य बंद होते हैं तो दिहाड़ी मज़दूर बेरोज़गार हो जाते हैं, स्कूल बंद होते हैं तो पढ़ाई गरीब बच्चों की रुकती है, लेकिन प्रदूषण फैलाने वाले बड़े स्रोतों पर सख़्ती करते समय प्रशासन के हाथ क्यों कांपने लगते हैं? यह सवाल सीधे तौर पर नीति-निर्माण की निष्पक्षता पर चोट करता है।

कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी सिर्फ कानूनी फटकार नहीं, बल्कि एक नैतिक आईना भी है। अदालत ने यह संदेश साफ कर दिया है कि अगर दिल्ली-NCR को रहने लायक बनाना है, तो सिर्फ गरीबों से कुर्बानी की उम्मीद नहीं की जा सकती। जब तक ताक़तवर और संपन्न वर्ग अपनी आदतें नहीं बदलेगा और नियमों का ईमानदारी से पालन नहीं करेगा, तब तक प्रदूषण का यह ज़हर यूँ ही सबसे कमज़ोर फेफड़ों में उतरता रहेगा।

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